माओवादी संगठन के वित्तीय खजाने में अभी भी जान बाकी
हैदराबाद । डेस्क: सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई से जूझते हुए भी भाकपा (माओवादी) संगठन के पास अभी भी मजबूत आर्थिक ताकत बची हुई है. हाल ही में आत्मसमर्पण करने वाले वरिष्ठ नेताओं ने पुलिस पूछताछ में खुलासा किया है कि संगठन के पास बिना किसी नई आय के भी करीब चार साल तक चलने लायक नकदी भंडार मौजूद है. यह जानकारी तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के माओवादी गढ़ों में जारी अभियानों के बीच एक नई चुनौती के रूप में उभर रही है.
माओवादियों का मजबूत आर्थिक भंडार
पुलिस सूत्रों के अनुसार, संगठन की तेलंगाना इकाई को हर महीने औसतन तीन करोड़ रुपये की आय हो रही थी, जबकि छत्तीसगढ़ में सालाना 300 करोड़ से अधिक का फंड जमा होता था. इसमें उत्तर बस्तर-माड़ क्षेत्र के खनन कार्यों से आने वाले 23 करोड़ रुपये का बड़ा योगदान था. एक्सटॉर्शन रैकेट के जरिए टेंडू पत्ता व्यापारियों, सड़क निर्माण ठेकेदारों और खनन कंपनियों से वसूली जाने वाली रकम ने संगठन को लंबे समय तक सहारा दिया.
हालांकि, 2024 से केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार की सख्ती के बाद वसूली में कमी आनी शुरू हो गई. एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "खनन और वन अनुबंधों पर 1.5 से 2 फीसदी तक का हिस्सा मांगना आम था, लेकिन अब यह चेन टूट रही है."
आत्मसमर्पण करने वाले एक प्रमुख नेता ने संगठन के वित्तीय ढांचे का जिक्र करते हुए कहा कि 30 फीसदी फंड हथियार निर्माण, लॉजिस्टिक्स और संचार पर खर्च होता है, 20 फीसदी स्थानीय 'क्रांतिकारी जन समितियों' को जाता है, जबकि बाकी 50 फीसदी केंद्रीय नेतृत्व के रिजर्व में रखा जाता है.
हाल ही में महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ पुलिस के समक्ष सरेंडर करने वाले तक्कलापल्ली वासुदेव राव उर्फ अशनना ने कथित तौर पर संगठन को सौंपे सात करोड़ रुपये का उल्लेख किया. इसी तरह, तेलंगाना के मल्लोजुला वेणुगोपाल उर्फ सोनू ने भी अपनी आत्मसमर्पण से पहले आंतरिक कलह का इशारा दिया.
'ऐतिहासिक भूल'
एक दुर्लभ कबूलनामे में, केंद्रीय समिति सदस्य पुल्लूरी प्रसाद राव उर्फ चंद्रन्ना ने 2004 के पीपुल्स वॉर ग्रुप और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के विलय को 'ऐतिहासिक भूल' करार दिया. उन्होंने कहा कि इससे नैतिक अनुशासन ढीला पड़ा और अत्यधिक वसूली की प्रवृत्ति बढ़ी, जिसने संगठन को कमजोर किया. इसके अलावा, सीआरपीएफ और जिला रिजर्व गार्ड की 'ऑपरेशन कागर' ने कूरियर नेटवर्क को बुरी तरह प्रभावित किया, जिससे 18 महीनों से अधिक समय तक समन्वय बाधित रहा.
अब मात्र 300-400 सशस्त्र कैडर सक्रिय
पुलिस का अनुमान है कि तेलंगाना, एओबी, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में अब मात्र 300-400 सशस्त्र कैडर सक्रिय हैं, जिनमें तेलंगाना इकाई में करीब 60 शामिल हैं. अधिकारी मानते हैं कि आदिलाबाद-करेगुट्टालु सड़क परियोजना पूरी होने पर जंगलों में घुसपैठ आसान हो जाएगी, जो माओवादियों की गतिविधियों को और सीमित कर देगी. चंद्रन्ना ने शहरी कार्रवाइयों को रोकने का कारण भी बताया-कम प्रभाव के कारण और कूरियर सिस्टम की उपेक्षा. सोनू का सरेंडर और उनकी आलोचना ने आंतरिक विभाजन को गहरा दिया, खासकर जब पूर्व महासचिव बसवराज ने उत्तराधिकारी के संकेत दिए.
सुरक्षा एजेंसियां अब इन खुलासों के आधार पर फंड ट्रेलिंग पर जोर दे रही हैं, ताकि संगठन की आर्थिक रीढ़ को तोड़ा जा सके. (फोटो फाइल से)