छत्तीसगढ़ में एथेनॉल उत्पादन की रफ्तार धीमी, लक्ष्य से काफी पीछे
रायपुर । संवाददाता: भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने (एथेनॉल ब्लेंडिंग) और विदेशी ईंधन पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच छत्तीसगढ़ को बड़ा झटका लगा है. राज्य को देश का एक प्रमुख एथेनॉल उत्पादक केंद्र बनाने की महत्वाकांक्षी योजना छह साल बाद भी केवल आंशिक रूप से ही धरातल पर उतर सकी है. साल 2020 में ₹5,000 करोड़ के भारी-भरकम निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर होने के बावजूद, आज छत्तीसगढ़ अपनी मूल योजना की तुलना में महज एक तिहाई क्षमता पर ही एथेनॉल का उत्पादन कर पा रहा है.
वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की चिंताओं और लगातार बढ़ती ईंधन की कीमतों के बीच एथेनॉल को पेट्रोल के एक मजबूत और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. ब्राजील जैसे देशों ने दशकों पहले इस बायोफ्यूल को अपने परिवहन तंत्र में सफलतापूर्वक शामिल कर एक मिसाल पेश की है.
इसी अवसर का लाभ उठाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने वर्ष 2020 में 29 कंपनियों के साथ समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए थे, जिनका उद्देश्य सालाना 100 करोड़ लीटर एथेनॉल उत्पादन क्षमता विकसित करना था.
लेकिन ज़मीनी हकीकत उम्मीदों के मुताबिक नहीं रही. परियोजना की समीक्षा से पता चलता है कि प्रस्तावित 29 कंपनियों में से केवल छह ने ही उत्पादन शुरू किया. इनमें से भी दो संयंत्र कच्चे माल की ऊंची लागत के कारण बंद हो चुके हैं, जिससे वर्तमान में राज्य में केवल चार एथेनॉल प्लांट ही काम कर रहे हैं.
ये चालू प्लांट मिलकर सालाना लगभग 33 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन कर रहे हैं. हालांकि यह उत्पादन छत्तीसगढ़ की अपनी जरूरतों को पूरा करने और दूसरे राज्यों को लगभग 7 करोड़ लीटर की आपूर्ति करने के लिए पर्याप्त है, लेकिन यह 100 करोड़ लीटर के मूल लक्ष्य से बहुत पीछे है.
उद्योग के जानकारों का मानना है कि यदि सभी योजनाबद्ध परियोजनाएं चालू हो जाती हैं, तो छत्तीसगढ़ में सालाना लगभग 65 करोड़ लीटर अतिरिक्त उत्पादन क्षमता जोड़ने की क्षमता अब भी मौजूद है.
वर्तमान में राज्य में रोजाना करीब 36.35 लाख लीटर पेट्रोल की खपत होती है. केंद्र सरकार के एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के तहत तेल कंपनियां पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाती हैं. यदि सभी 29 परियोजनाएं पूरी हो जातीं, तो छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय स्तर पर इस कार्यक्रम का एक बड़ा सप्लायर बनकर उभर सकता था.
ये एथेनॉल संयंत्र बेमेतरा, रायपुर, दुर्ग, मुंगेली, जगदलपुर, जांजगीर-चांपा, कवर्धा, महासमुंद, रायगढ़, सरगुजा और बिलासपुर जैसे कई जिलों में स्थापित किए जाने थे. गन्ने, मक्के और खराब या अधिशेष अनाज से देश में ही तैयार होने वाला एथेनॉल न केवल विदेशी मुद्रा की बचत करता है, बल्कि ग्रामीण उद्योगों और कृषि क्षेत्र को भी मजबूत करता है.
छत्तीसगढ़ पेट्रोल-डीजल एसोसिएशन के अध्यक्ष अखिल धगत ने कहा कि पेट्रोल पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल उत्पादन का विस्तार सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है. उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षों में राज्य में और अधिक एथेनॉल प्लांट चालू होंगे, जिससे घरेलू ईंधन उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और देश के बायोफ्यूल लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी.
भले ही शुरुआत धीमी रही हो, लेकिन उद्योग जगत को अब भी भरोसा है कि शेष परियोजनाओं के सफल क्रियान्वयन से छत्तीसगढ़ देश के बायोएनर्जी क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बन सकता है. Symbolic Photo