यूरोप में सर्दियों से पहले गहराया ऊर्जा संकट: IEA प्रमुख ने दी चेतावनी
सर्दियों से ठीक पहले यूरोप के पास गैस का स्टॉक ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर है. आईईए के प्रमुख फातिह बिरोल ने आगाह किया है कि अगर वैश्विक स्तर पर कोई और झटका लगा, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है.
नई दिल्ली । डेस्क: दुनिया भर में गहराते भू-राजनीतिक तनाव और मध्य पूर्व संकट के बीच यूरोप एक गंभीर ऊर्जा संकट की ओर बढ़ रहा है. अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के प्रमुख फातिह बिरोल ने चेतावनी दी है कि यूरोप में प्राकृतिक गैस के भंडार ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर हैं. ऐसे में यदि आने वाली सर्दियों में मौसम अधिक सख्त रहता है या आपूर्ति में कोई नई बाधा आती है, तो यूरोप के लिए इस झटके को सहन कर पाना बेहद मुश्किल होगा.
बर्लिन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान बिरोल ने कहा कि आमतौर पर सर्दियों में प्रवेश करने से पहले यूरोपीय देशों के पास पर्याप्त गैस का स्टॉक होता है, लेकिन इस बार भंडारण क्षमता केवल 72 प्रतिशत तक ही सिमट कर रह गई है, जो कि सामान्य औसत 90 प्रतिशत से काफी कम है.
गैस की यह कमी लगभग 1 से 1.2 करोड़ घरों को मिलने वाली ऊर्जा के बराबर है. इसके कारण यूरोपीय संघ (EU) के देश अब घरेलू और व्यावसायिक उपयोग में कटौती जैसे विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और बाब अल-मंडेब जैसे रणनीतिक जलमार्गों में तनाव के कारण लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई है.
बिरोल के अनुसार, यूरोप अब एशियाई देशों के साथ गैस हासिल करने की प्रतिस्पर्धा में है, जिससे आने वाले महीनों में कीमतें और बढ़ने की आशंका है. इसके अलावा, यूक्रेन द्वारा रूसी रिफाइनरियों पर किए जा रहे हमलों के कारण यूरोप में डीजल की आपूर्ति पर भी गहरा असर पड़ा है, जो परिवहन और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
ऊर्जा विशेषज्ञ के मुताबिक, पहले की नीतियों और रणनीतिक कमियों ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है. यूरोप लंबे समय तक रूसी गैस पर अत्यधिक निर्भर रहा और परमाणु ऊर्जा से दूरी बनाई, जिससे उसके पास घरेलू स्तर पर कोई बड़ा विकल्प नहीं बचा.
ऊर्जा के बढ़ते राजनीतिकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए बिरोल ने कहा कि उन्होंने अपने पूरे करियर में ऊर्जा क्षेत्र पर राजनीति और भू-राजनीति का इतना गहरा और खतरनाक प्रभाव कभी नहीं देखा. फिलहाल दुनिया के पास ऊर्जा कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए बहुत कम बफर ज़ोन बचा है, जिसके कारण यूरोप को इस साल और अगले साल भी कई कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.