भारत में शिक्षा संकट: खतरे में 20 लाख सरकारी शिक्षकों की नौकरी
नई दिल्ली । डेस्क: भारत की शिक्षा प्रणाली वर्तमान में एक अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रही है, जहां प्राथमिक और उच्च-प्राथमिक स्तर पर कार्यरत लगभग 20 लाख सरकारी शिक्षकों का भविष्य अधर में लटका हुआ है. केंद्रीय सरकार और सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के कारण देश भर के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों के इन शिक्षकों पर छंटनी की तलवार लटक रही है.
इस संकट की मुख्य जड़ शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) 2009 के तहत अनिवार्य 'शिक्षक पात्रता परीक्षा' (TET) पास न करना और निर्धारित समय सीमा के भीतर पेशेवर प्रशिक्षण (B.Ed या D.El.Ed) पूरा न कर पाना है.
हालांकि कानून लागू होने के समय अप्रशिक्षित शिक्षकों को योग्यता हासिल करने के लिए कई अवसर और समय विस्तार दिया गया था, लेकिन एक बड़ा वर्ग अभी भी इन कानूनी मानदंडों को पूरा करने में विफल रहा है.
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता और बिना आवश्यक योग्यता वाले शिक्षकों को कक्षाओं में रखना कानूनी रूप से असंभव है.
केंद्र सरकार के कड़े रुख के बाद दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में शिक्षकों के बीच हड़कंप मच गया है.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों शिक्षक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जिनका तर्क है कि वे पिछले 10-15 वर्षों से सफलतापूर्वक पढ़ा रहे हैं और अब 40-45 वर्ष की आयु में उनके लिए नई परीक्षा देना या अन्य रोजगार ढूंढना नामुमकिन है.
शिक्षकों ने सरकार से मानवीय आधार पर विचार करने की गुहार लगाई है, क्योंकि इस फैसले से लाखों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो सकता है.