दिल्ली को स्मॉग से निपटने कृत्रिम बारिश की मंजूरी, Oct-Nov में होगा
नई दिल्ली । डेस्क: दिल्ली सरकार ने शहर में प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए कृत्रिम बारिश (क्लाउड सीडिंग) की योजना को हरी झंडी दे दी है. पर्यावरण मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा ने बुधवार को बताया कि इस परियोजना के लिए लगभग 3.21 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है.
यह अक्टूबर और नवंबर में उत्तरी दिल्ली में हिंदन हवाई अड्डे से सेसना विमान के माध्यम से किया जाएगा, जिसकी निगरानी आईआईटी कानपुर करेगा.
मंत्री ने कहा, “दिल्ली सरकार ने कृत्रिम बारिश की योजना बनाई थी, और अब हमें इसके लिए आवश्यक अनुमति मिल गई है. अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली में इसका परीक्षण होगा. यह उत्तरी दिल्ली में हिंदन हवाई अड्डे से किया जाएगा.”
उन्होंने आगे कहा कि इस तकनीक से दिल्लीवासियों को स्मॉग से राहत मिलने की उम्मीद है.
क्लाउड सीडिंग की यह तकनीक पहले से ही संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और यूएई जैसे देशों में सूखे और प्रदूषण से निपटने के लिए उपयोग की जाती है. दिल्ली में यह पहले जुलाई में होने वाला था, लेकिन प्रतिकूल मौसम के कारण इसे स्थगित करना पड़ा.
इस परियोजना को कुछ शर्तों के साथ मंजूरी दी गई है. विमान चालक दल में कोई विदेशी नागरिक शामिल नहीं होगा, और क्लाउड सीडिंग के दौरान हवाई वीडियोग्राफी नहीं की जाएगी.
यह अभियान केवल अनुमति प्राप्त क्षेत्र तक ही सीमित रहेगा, और इस दौरान उस क्षेत्र में अन्य उड़ानों पर प्रतिबंध रहेगा. नियमों के उल्लंघन की स्थिति में इसे नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) को रिपोर्ट करना होगा.
कृत्रिम वर्षा कैसे होती है
कृत्रिम वर्षा, क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding) नामक प्रक्रिया से होती है, जिसमें विमानों या ड्रोन से बादलों में सिल्वर आयोडाइड या शुष्क बर्फ़ जैसे रसायन छोड़े जाते हैं. ये रसायन बादलों में नमी को आकर्षित करते हैं, जिससे छोटी जल बूंदें या बर्फ के क्रिस्टल बनते हैं, जो फिर भारी होकर बारिश की बूंदों के रूप में नीचे गिरते हैं.
बादल का चयन: सबसे पहले ऐसे बादलों का चयन किया जाता है जिनमें पर्याप्त नमी हो.
रसायनों का छिड़काव: चयनित बादलों में विमान, रॉकेट या ड्रोन की मदद से सिल्वर आयोडाइड, शुष्क बर्फ़ (ठोस कार्बन डाइऑक्साइड), नमक या पोटेशियम
आयोडाइड जैसे रसायनों का छिड़काव किया जाता है.
नमी को इकट्ठा करना: ये रसायन बादलों में जलवाष्प को आकर्षित करते हैं.
बादल के कणों का बढ़ना: हवा में मौजूद नमी, इन रसायनों के संपर्क में आने से छोटी-छोटी जल बूंदों या बर्फ के क्रिस्टलों का रूप ले लेती है.
बारिश का होना: जब ये बूंदें या क्रिस्टल पर्याप्त भारी हो जाते हैं, तो वे गुरुत्वाकर्षण के कारण बादलों से नीचे गिरने लगते हैं, जिससे बारिश होती है.