राज्यपाल पर विवादित पोस्ट: बिना शर्त माफी के बाद HC ने रद्द की FIR
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य के राज्यपाल से जुड़े एक कार्टून-स्टाइल्ड फेसबुक पोस्ट को शेयर करने के मामले में दो व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को खारिज कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला तब सुनाया, जब याचिकाकर्ताओं ने अदालत में बिना शर्त माफीनामा पेश किया और विवादित सामग्री को पूरी तरह से हटाने तथा भविष्य में ऐसी कोई भी गतिविधि न दोहराने का हलफनामा दिया.
यह पूरा विवाद 15 अप्रैल 2026 को सह-आरोपी अंकुर अली द्वारा मूल रूप से अपलोड की गई एक फेसबुक पोस्ट से जुड़ा है. इस पोस्ट में असमिया भाषा में एक कैप्शन के साथ राज्यपाल का कार्टून साझा किया गया था, जिसे बाद में इन दोनों याचिकाकर्ताओं ने अपने-अपने अकाउंट से री-शेयर किया.
इसके बाद, दोनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान), 353(1) और 353(2) (सार्वजनिक उपद्रव) के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 66 के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया था.
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि याचिकाकर्ताओं पर किसी भी तरह की शारीरिक हिंसा भड़काने या किसी वास्तविक हिंसक घटना को अंजाम देने का कोई आरोप नहीं है.
शुरुआत में जांच लंबित होने का हवाला देकर मामले को रद्द करने का विरोध करने वाली राज्य सरकार ने भी बाद में अपना रुख बदल लिया. सरकारी स्तर पर मामले की व्यापक समीक्षा के बाद, राज्य ने कुछ विशिष्ट शर्तों के अधीन समझौते के लिए अपनी आधिकारिक सहमति दे दी.
इसके साथ ही, शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या 2) ने भी तय शर्तों के अनुपालन के आधार पर कार्यवाही को समाप्त करने पर अपनी रजामंदी जता दी.
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल दो पक्षों के बीच का कोई निजी समझौता नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक पद की गरिमा को सुरक्षित रखने का एक सुविचारित प्रयास है. इसी के तहत याचिकाकर्ताओं को उसी दर्शक वर्ग के सामने प्रमुखता से अपनी माफी प्रकाशित करने, अखबारों में सार्वजनिक माफीनामा देने और विवादित सामग्री को स्थायी रूप से हटाने का निर्देश दिया गया है ताकि कथित पोस्ट के प्रभाव को खत्म किया जा सके.
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब राज्य सरकार और शिकायतकर्ता खुद सुलह के लिए तैयार हैं और आरोपी अपने कृत्य पर गहरा पछतावा व्यक्त कर चुके हैं, तो ऐसे में आपराधिक कार्यवाही को बेवजह खींचने से न्याय का कोई वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होगा. इन सभी बदली हुई परिस्थितियों और सुधार के वादे को देखते हुए अदालत ने अंततः एफआईआर को रद्द करने का आदेश पारित कर दिया.