जीएम फसलों को लेकर भारत में चिंता
जो सब्ज़ियां और फल हमारे देश में आयात होते हैं, उनमें जीएमओ कंटेंट की आशंका है
रायपुर | डेस्कः अल्फ्रेड नोबेल और आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिकों ने कहा था "विज्ञान वरदान भी हो सकता है और अभिशाप भी!" अब ज़रा सोचिए अगर आलू में कार्बोहाइड्रेट की जगह प्रोटीन मिलने लगे या सेब मोटापा बढ़ाने लगे या आपकी मूंछ दाढ़ी उगाने लगे, आपको गंजा करने लगे.
तो क्या ये बदलाव हमारे लिए फायदेमंद होंगे या खतरनाक? कहीं आप भी ऐसे फल औऱ सब्जियां तो नहीं खा रहे हैं?
दुनिया भर में जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से ऐसे-ऐसे कुछ प्रयोग हो रहे हैं, जो किसी साइंस फिक्शन फिल्म से कम नहीं.
विज्ञान अब सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहा यह हमारे खेतों और थालियों तक पहुँच चुका है. भारत भी इससे अछूता नहीं है.
जो सब्ज़ियां और फल हमारे देश में आयात होते हैं, उनमें ‘जेनेटिकली मॉडिफाइड’ यानी जीएमओ कंटेंट की आशंका है.
खास बात ये है कि भारत में कई बार बिना किसी जांच के ऐसे न सिर्फ प्रोसेस्ड फूड बल्कि फल व सब्जियां भी आ रही हैं.
जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज़्म यानी जीएमओ आखिर होते क्या हैं?
जीएमओ एक ऐसी तकनीक है जिसमें किसी पौधे, जानवर या सूक्ष्म जीव के डीएनए को वैज्ञानिक तरीके से बदला जाता है.
इस प्रक्रिया को जेनेटिक इंजीनियरिंग कहते हैं. मान लीजिए बैगन में कीड़ों से लड़ने की क्षमता किसी और पौधे से या सांप-बिच्छू से लेकर जोड़ दी जाए, तो वो एक जीएम फसल बन जाती है.
दुनियाभर में अब तक कई जीएम फसलें उगाई जा चुकी हैं— टमाटर, मकई, आलू, पपीता, सेब से लेकर खीरा तक लिस्ट लंबी है.
हालांकि भारत ने 24 ऐसी फसलों के आयात पर रोक लगा रखी है, जिनमें जीएमओ कंटेंट होने की आशंका है.
इनमें बैगन, मक्का, चावल, सोयाबीन, आलू, सेब, गन्ना, टमाटर, गेहूं जैसी फसलें शामिल हैं. लेकिन इतने से बात कहां बनने वाली है.
बिना अनुमति बेचना प्रतिबंधित
भारत में 2006 के ‘फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट’ के मुताबिक, किसी भी जीएम फूड को बिना अनुमति के आयात या बेचना पूरी तरह से प्रतिबंधित है.
लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि हो सकता है कि जो फल-सब्ज़ियां "नॉन-जीएम" के नाम पर आ रही हैं, उनमें भी जीएम कंटेंट हो.
पिछले 10 सालों में भारत में ताजे फलों और सब्ज़ियों का आयात 25% तक बढ़ गया है.
सरकारी लैब्स जीएम जांच के लिए तैयार नहीं
जीएम पर CSE के लगातार किए जा रहें रिपोर्ट्स में एफएसएसएआई के पूर्व चेयरमैन पवन अग्रवाल ने खुद कहा था कि हमारी लैब्स फिलहाल हर तरह के फूड में जीएम की जांच करने में पूरी तरह सक्षम नहीं हैं.
दरअसल, CSE की रिपोर्ट बताती है कि देश की सरकारी लैब्स को जीएम जांच के लिए तैयार ही नहीं किया गया है.
हालांकि कुछ निजी लैब्स हैं, जो 0.01% तक की जीएम सामग्री का पता लगा सकती हैं.
इसमें एक मुश्किल और है. 2020 में नेशनल फूड लैबोरेटरी के टेंडर में ये तक लिखा गया कि जब भी जीएम रेग्युलेशन पास होगा, तब लैब्स को ऐसी जांच करनी होगी.
यानी अब तक रेग्युलेशन ही पास नहीं हुआ है. देश की सिर्फ 32% निजी फूड टेस्टिंग लैब्स ही रासायनिक अवशेष चेक कर सकती हैं.
अब बात जीएम को लेकर हालिया स्थिति
कुछ महीने पहले हुए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फूड टेक्नोलॉजी के फूड बॉयोटेक्नोलॉजी विभाग और एंटरप्रेन्योरशिप और मैनेजमेंट तंजावुर (एनआईएफटीईएम-टी) ने साइंस डायरेक्ट पर प्रकाशित एक स्टडी पीसीएस एंड एफटीआईएस बेस्ड स्क्रीनिंग ऑफ जेनेटिकली मोडिफाइड मेज इन प्रोसेस्ड एंड अनप्रोसेस्ड फूड्स इन द इंडियन मार्केट में वैज्ञानिकों के शोध का निष्कर्ष यह बताता है कि जीएम मक्का का पता लगाने के लिए एटीआर -एफटीआईआर और पीसीआर आधारित तकनीकों का उपयोग किया गया था .
पीसीआर परीक्षण से विश्लेषण किए गए 34 नमूनों में से 15.39% जीएम मक्का के लिए पॉजिटिव पाए गए.
जबकि एटीआर-एफटीआईआर स्पेक्ट्रोस्कोपी में 20% मक्का नमूनों में स्टैंडर्ड जीएम मक्का के साथ अधिक संरचनात्मक समानता पाई गई.
अवैध जीएम मक्का की खेती
शोध में पाया गया कि जीएम मक्का का एक नमूना (डब्ल्यूएस3), जो अवैध जीएम मक्का खेती का सबूत है, तंजावुर, तमिलनाडु के पास स्वामी मुथायन स्टेडियम, मुथैयन कोविल स्ट्रीट, कोरथाकुडी से लिया गया था.
इसके अलावा, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में भी जीएम मक्का की उपस्थिति के प्रमाण मिले हैं.
एक स्टडी में पता चला कि बाजार में मिल रहे कुछ प्रोसेस्ड फूड और कच्चे मक्के में अवैध जीएम मक्का पाया गया.
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, एंट्राप्रेनोर्शिप एंड मैंनेजमेंट और अन्य संस्थानों की इस स्टडी में बताया गया कि 34 में से करीब 15% सैंपल्स में जीएम मक्का था.
तमिलनाडु के तंजावुर में तो एक जगह से अवैध जीएम मक्का की खेती का भी सबूत मिला.
यही नहीं, पहले भी बीटी बैंगन, जीएम सोयाबीन और एचटी बीटी कपास की अवैध खेती सामने आ चुकी है.
छत्तीसगढ़ की राजधानी में भी इसी तरह की जीएम फसलें कुछ साल पहले लगाई गई थीं. लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ खास नहीं हुआ.
सिर्फ बीटी कपास की मंजरी
इस वक्त भारत में सिर्फ बीटी कपास ही इकलौती ऐसी जीएम फसल है, जिसे सरकार ने खेती के लिए मंजूरी दी है.
सरकार ने 2022 में जीएम सरसों को भी मंजूरी दी थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद ट्रायल पर रोक लग गई.
सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच में इस पर मतभेद हुआ. उच्चतम न्यायलय के विभाजित निर्णय में इसके उपयोग की अनुमति देने से पहले एक व्यापक सुरक्षा रणनीति बनाने की बात कही गई.
सुप्रीम कोर्ट में मस्टर्ड हाइब्रिड-11 (डीएमएच-11) सरसों के पर्यावरणीय विमोचन के लिए जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति ('जीईएसी') की मंजूरी को चुनौती देने वाली सिविल रिट याचिकाओं के एक बैच में, बीवी नागरत्ना और संजय करोल, जेजे की डिवीजन बेंच ने मामले में विभाजित फैसला सुनाया.
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने जीईएसी और पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) द्वारा दी गई मंजूरी को रद्द कर दिया, न्यायमूर्ति करोल ने इसे बरकरार रखा.
सरकार चाहती है नियमों में बदलाव
अब सरकार चाहती है कि जीएम फसलों से जुड़े नियमों में कुछ बदलाव किए जाएं.
31 दिसंबर 2024 को एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी हुआ, जिसमें जीएम जीवों के निर्माण और आयात को लेकर नियमों में पारदर्शिता की बात कही गई.
लेकिन कई एक्सपर्ट्स और पर्यावरणविदों ने इसका विरोध किया है उनका कहना है कि इस ड्राफ्ट से हितों का टकराव और भी बढ़ सकता है.
जो जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए, उसे कुछ खास सदस्यों पर डाल दिया गया है.
पर्यावरण, सेहत और किसानों के हितों को लेकर चिंता
जीएम फसलों को लेकर सबसे ज़्यादा चिंता की बात पर्यावरण, सेहत और किसानों के हितों को लेकर है.
पर्यावरणविदों को डर है कि जीएम फसलें हमारी जैव विविधता को खत्म कर देंगी और खतरनाक खरपतवार पैदा कर सकती हैं.
किसान संगठनों को चिंता है कि बीजों पर उनका कंट्रोल खत्म हो जाएगा और बड़े कॉरपोरेट इसे हथिया लेंगे.
कई रिपोर्ट्स से ये बात साफ हुई है कि बीटी कपास की वजह से कई किसान कर्ज में डूबे और आत्महत्याएं तक हुईं.
सबसे भयावह ये है कि इन जीएम सब्जियों, फलो, दलहनों, तिलहनों का हमारे स्वास्थ्य पर, हमारे जीन पर क्या असर पड़ेगा, इसे लेकर अब तक वैज्ञानिक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाएं हैं.
देश में जीएम को लेकर चल रही बहस के बीच ये कहना भी मुश्किल है कि आखिर लकीर कहाँ तक खींची जाएगी.