अफ्रीका के खनिज खजाने पर चीन की बड़ी बाजी, 16 अरब डॉलर झोंका
अफ्रीका के समृद्ध खनिज संसाधनों पर वैश्विक शक्तियों की नजर है. बीजिंग की नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन ने अफ्रीका में वैल्यू एडिशन और मिनरल प्रोसेसिंग प्रोजेक्ट्स में अरबों डॉलर झोंके हैं, जिससे महाद्वीप के औद्योगिकीकरण को नया बल मिल रहा है.
नई दिल्ली । डेस्क: अफ्रीका महाद्वीप के समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों और खनिज संपदा से अधिक से अधिक कमाई सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग बढ़ाने की कोशिशों के बीच एक बड़ा खुलासा सामने आया है. बीजिंग स्थित कंसल्टेंसी 'डेवलपमेंट रीइमैजिन्ड' की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक चीनी निवेशकों ने अफ्रीका भर में खनिज प्रसंस्करण और विनिर्माण से जुड़ी परियोजनाओं में 16 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है.
कॉपर, कोबाल्ट और लौह अयस्क जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के वैश्विक आपूर्तिकर्ता देशों - जैसे डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, गिनी और जिम्वाह्वे - द्वारा कच्चे खनिजों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने और घरेलू स्तर पर प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के फैसलों के बाद चीनी निवेश का यह प्रवाह देखने को मिल रहा है.
41.2 अरब डॉलर के कुल निवेश में वैल्यू एडिशन और प्रोसेसिंग पर जोर
रिपोर्ट में वर्ष 2024 के चीन-अफ्रीका सहयोग सम्मेलन के एक्शन प्लान के तहत की गई प्रतिबद्धताओं का विश्लेषण किया गया है. आंकड़े दर्शाते हैं कि इस वर्ष जून तक 15 देशों में फैली 32 खनन, अन्वेषण और विकास परियोजनाओं में कुल 41.2 अरब डॉलर का निवेश किया गया था.
इनमें से 19 परियोजनाएं केवल खनिज निष्कर्षण तक सीमित न रहकर अफ्रीका में ही प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग और विनिर्माण यानी "मिनरल वैल्यू एडिशन" से जुड़ी हुई हैं, जिन पर 16.3 अरब डॉलर की राशि खर्च की जा रही है.
गिनी में स्थित दुनिया की सबसे बड़ी 23 अरब डॉलर की सिमंडौ लौह अयस्क परियोजना जैसी कुछ विशाल डील्स के कारण वैल्यू एडिशन परियोजनाओं का हिस्सा कुल ट्रैक किए गए मूल्य का लगभग 40 प्रतिशत रहा.
भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और संसाधनों पर प्रभुत्व की होड़
अमेरिका और पश्चिमी देशों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अफ्रीकी महाद्वीप में प्रसंस्करण इकाइयों को स्थापित करने के अभियान का समर्थन किया है. बोत्सवाना के राष्ट्रपति डुमा बोको के साथ हालिया बैठक में शी जिनपिंग ने स्पष्ट किया कि अफ्रीका के संसाधन अफ्रीका के हैं और इनका उपयोग भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के लिए नहीं होना चाहिए.
हालांकि, वाशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो जॉन कालब्रेस के अनुसार बीजिंग अपनी व्यावसायिक रणनीतियों को साधने के साथ खुद को अफ्रीका के औद्योगिकीकरण के साथी के रूप में पेश कर रहा है.
अमेरिका की जवाबी रणनीति और अफ्रीकी देशों के सामने चुनौतियां
दूसरी ओर, वाशिंगटन भी अफ्रीका के महत्वपूर्ण खनिजों तक अपनी पहुंच बढ़ा रहा है. अमेरिका ने कांगो के निर्दिष्ट खनन संपत्तियों तक तरजीही पहुंच का समझौता किया है और उसके निवेशक केन्या के दुर्लभ पृथ्वी तत्वों से समृद्ध मरिमा हिल के अधिकारों के लिए भी होड़ में शामिल हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिस्पर्धात्मक निवेश से अफ्रीकी सरकारों को बेहतर शर्तों पर तकनीक और पूंजी मिल सकती है, लेकिन जब तक स्थानीय प्रसंस्करण और कौशल हस्तांतरण पर प्रवर्तनीय प्रतिबद्धताएं तय नहीं की जातीं, तब तक देशों के लिए अपने संसाधनों का पूरा लाभ उठाना एक चुनौती बना रहेगा.