मध्य पूर्व में शांति के लिए चीन का 'चार-सूत्रीय प्रस्ताव'
बीजिंग । डेस्क: चीन के चाइना पीपल्स डेली के हवाले से खबर है कि हाल ही में अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और चीनी राष्ट्रपति शी जिनफिंग के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता ने वैश्विक कूटनीति में एक नई चर्चा छेड़ दी है. मध्य पूर्व और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और अस्थिरता के बीच, राष्ट्रपति शी ने शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक 'चार-सूत्रीय प्रस्ताव' पेश किया है. यह प्रस्ताव न केवल चीन के दीर्घकालिक रुख को दर्शाता है, बल्कि संघर्षों के साये में जी रहे इस क्षेत्र के लिए एक व्यवहारिक 'चीनी दृष्टिकोण' भी प्रदान करता है.
वर्ष 2026 की वैश्विक चुनौतियों को देखते हुए यह पहल अत्यंत महत्वपूर्ण है. संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की नवीनतम रिपोर्टों ने चेतावनी दी है कि यदि मध्य पूर्व का संकट जारी रहा, तो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को $200 बिलियन से अधिक का नुकसान हो सकता है, जिससे दुनिया भर में 32 मिलियन लोग गरीबी की रेखा के नीचे जा सकते हैं. इस पृष्ठभूमि में, चीन का यह शांति रोडमैप अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए आशा की एक नई किरण बनकर उभरा है.
शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सिद्धांत: सुरक्षा का आधार
शी जिनफिंग के प्रस्ताव का पहला और सबसे महत्वपूर्ण बिंदु शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत का पालन करना है. चीन का मानना है कि मध्य पूर्व के देश एक-दूसरे से अलग नहीं रह सकते. वे भौगोलिक और ऐतिहासिक रूप से आपस में जुड़े हुए पड़ोसी हैं. तनाव जितना अधिक होगा, शांति की रक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है.
चीन ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी इस भूमिका को सक्रिय रूप से निभाया है. सऊदी अरब और ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौता कराना हो, या 14 फिलिस्तीनी गुटों को एक मंच पर लाकर 'बीजिंग घोषणापत्र' पर हस्ताक्षर करवाना, चीन ने बार-बार संवाद और आपसी विश्वास के सेतु बनाने का कार्य किया है. चीन का सुझाव है कि क्षेत्र में एक ऐसी स्थायी सुरक्षा संरचना विकसित की जानी चाहिए जो सहकारी और टिकाऊ हो.
राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान: बाहरी हस्तक्षेप पर रोक
प्रस्ताव का दूसरा स्तंभ राष्ट्रीय संप्रभुता के सिद्धांत पर आधारित है. चीन का दृढ़ मत है कि मध्य पूर्व के भविष्य का निर्धारण वहां के लोगों और देशों द्वारा स्वतंत्र रूप से किया जाना चाहिए. संप्रभुता किसी भी राष्ट्र, विशेषकर विकासशील देशों के लिए एक अनिवार्य शर्त है.
चीन ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि बाहरी शक्तियों को क्षेत्रीय मामलों में दखलंदाजी बंद करनी चाहिए. सैन्य बल का प्रयोग, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप और दूसरे देशों की संप्रभुता का उल्लंघन केवल अराजकता को जन्म देता है. चीन क्षेत्रीय देशों द्वारा अपनी क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय गरिमा की रक्षा के प्रयासों का समर्थन करता है, ताकि वे अपने विकास के अधिकार को सुरक्षित रख सकें.
अंतरराष्ट्रीय कानून का शासन: न्यायपूर्ण व्यवस्था की मांग
तीसरा सुझाव अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन और मानकों को बनाए रखने पर केंद्रित है. चीन का आरोप है कि मध्य पूर्व में संघर्ष के लंबा खींचने का एक प्रमुख कारण कुछ देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय मानदंडों की अनदेखी करना है. एकतरफा प्रतिबंध और अत्यधिक दबाव की नीतियां न केवल बहुपक्षवाद को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था की नींव को भी कमजोर करती हैं.
चीन 'जंगल राज' की मानसिकता को खारिज करते हुए संयुक्त राष्ट्र (UN) की केंद्रीय भूमिका पर जोर देता है. राष्ट्रपति शी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय नियमों का चयनात्मक उपयोग बंद होना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होने चाहिए ताकि संघर्षों के प्रसार को रोका जा सके और एक न्यायपूर्ण शांति ढांचा तैयार किया जा सके.
विकास और सुरक्षा का समन्वय: समृद्धि का मार्ग
प्रस्ताव का चौथा और अंतिम बिंदु विकास और सुरक्षा के बीच एक समन्वित दृष्टिकोण अपनाने की वकालत करता है. चीन का मानना है कि सुरक्षा विकास के लिए माहौल तैयार करती है, जबकि विकास दीर्घकालिक सुरक्षा की गारंटी देता है. चीन ने हमेशा अपनी विकास यात्रा के अनुभवों को मध्य पूर्व के देशों के साथ साझा करने की इच्छा जताई है.
स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग से लेकर मरुस्थलीय क्षेत्रों में कृषि तकनीक साझा करने तक, चीन सक्रिय रूप से योगदान दे रहा है. हाल के संकटों के दौरान, चीन ने ईरान, जॉर्डन, लेबनान और इराक जैसे देशों को तत्काल मानवीय सहायता और आवश्यक सामग्री भी पहुंचाई है. चीन अपनी आधुनिकीकरण प्रक्रिया से उत्पन्न अवसरों को इस क्षेत्र के साथ साझा करना चाहता है ताकि आर्थिक मजबूती के जरिए संघर्षों की जड़ों को खत्म किया जा सके.
इतिहास के सही पक्ष में खड़ा चीन
अंततः, चीन का यह चार-सूत्रीय प्रस्ताव मध्य पूर्व के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया गया है. वर्तमान में यह क्षेत्र शांति और संघर्ष के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. ऐसे समय में, चीन का शांतिपूर्ण संवाद और राजनीतिक समाधान पर जोर देना यह दर्शाता है कि वह एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है. चीन का यह दृष्टिकोण न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक है, बल्कि यह वैश्विक शांति और मानवीय प्रगति के प्रति उसकी गहरी प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पहल को मध्य पूर्व में एक नए शांतिपूर्ण युग की शुरुआत के रूप में देख रहा है.