ब्रह्मपुत्र पर चीन का बांध: भारत पर असर?
नई दिल्ली । डेस्क: तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी के उद्गम क्षेत्र में चीन ने एक विशाल बांध परियोजना शुरू की है. जो भारत और बांग्लादेश जैसे निचले क्षेत्रों के लिये चिंता का विषय बन गई है. शनिवार को चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने तिब्बत के दक्षिण-पूर्वी हिस्से, न्यिंगची में इस परियोजना की आधारशिला रखी.
यह क्षेत्र भारत के अरुणाचल प्रदेश की सीमा के करीब है.
चीन की आधिकारिक समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, यह परियोजना 1.2 ट्रिलियन युआन (लगभग 167 अरब डॉलर) की लागत से बन रही है और इसमें पांच जलविद्युत स्टेशन शामिल होंगे. इस बांध का उद्देश्य तिब्बत के स्थानीय बिजली जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति करना है.
दावा किया जा रहा है कि यह परियोजना यांग्त्जी नदी पर बने थ्री गॉर्जेस बांध से भी अधिक बिजली उत्पादन करेगी.
भारत की चिंतायें
भारत ने इस परियोजना को लेकर पहले ही अपनी आपत्ति जता चुका है.
जनवरी में, भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि चीन को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि ऊपरी क्षेत्रों में उसकी गतिविधियों से ब्रह्मपुत्र के निचले क्षेत्रों में बसे देशों के हितों को नुकसान न पहुंचे. जवाब में, चीन ने दावा किया कि यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र का तिब्बती नाम) पर बन रहा यह बांध निचले क्षेत्रों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं डालेगा.
पर्यावरण विशेषज्ञों ने तिब्बती पठार जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस तरह की विशाल परियोजना के संभावित खतरों को लेकर चेतावनी दी है.
उनका कहना है कि इससे क्षेत्र की पारिस्थितिकी में अपरिवर्तनीय बदलाव आ सकते हैं. ब्रह्मपुत्र नदी का प्रवाह और उसका पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होने की आशंका है, जिसका असर भारत और बांग्लादेश के कृषि, मत्स्य पालन और जल आपूर्ति पर पड़ सकता है.
यह परियोजना चीन के कार्बन न्यूट्रैलिटी लक्ष्यों और तिब्बत के विकास से जुड़ी है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
भारत सरकार और पर्यावरण संगठनों का कहना है कि इस तरह की परियोजनाओं पर अंतर्राष्ट्रीय सहमति और पारदर्शिता जरूरी है, ताकि नदी के प्रवाह और उससे जुड़े देशों की आजीविका पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.