छत्तीसगढ़ में दो वरिष्ठ माओवादी नेताओं का संभावित आत्मसमर्पण
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान के बीच एक बड़ी सफलता मिल सकती है, जहां दो वरिष्ठ माओवादी नेता रूपेश और रणिता ने राज्य के वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क साधा है. अधिकारियों के मुताबिक, दोनों नेताओं के जल्द ही आत्मसमर्पण करने की संभावना है.
रूपांश, जो दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZC) के सदस्य हैं और दो दशकों से अधिक समय से दंडकारण्य के जंगलों में सक्रिय रहे हैं, उनका आत्मसमर्पण सुरक्षा बलों के लिए न सिर्फ रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होगा, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से भी एक बड़ी जीत होगी. वहीं, रणिता माड़ डिवीजन की प्रमुख हैं, जो माओवादियों के गढ़ अबूझमाड़ क्षेत्र में सक्रिय रहा है.
संगठन के भीतर बढ़ता संकट
यह घटनाक्रम प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के भीतर चल रहे संकट की पृष्ठभूमि में आया है. हाल ही में, वरिष्ठ पोलित ब्यूरो सदस्य वेणुगोपाल उर्फ सोनू ने सशस्त्र संघर्ष को समाप्त करने का ऐलान किया था, हालांकि केंद्रीय समिति ने इस दावे को खारिज करते हुए वेणुगोपाल पर संगठन को विभाजित करने की साजिश रचने का आरोप लगाया था.
वेणुगोपाल के शांति आह्वान के बाद माड़ डिवीजन, उत्तरी बस्तर डिवीजन और गढ़चिरौली डिवीजन सहित कई इकाइयों ने हथियार डालने की तत्परता दिखाते हुए वेणुगोपाल के शांति प्रस्ताव को अपना समर्थन दिया था.
वेणुगोपाल की अगली रणनीति
हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार की खबर के अनुसार खुफिया अधिकारियों ने बताया कि वेणुगोपाल, जो महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ सीमा के पास डेरा डाले हुए हैं, रूपांश और रणिता के अगले कदम पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं. एक अधिकारी के अनुसार, वेणुगोपाल निचले रैंक में बढ़ते असंतोष से अवगत हैं और इन आत्मसमर्पणों के परिणाम के आधार पर अपनी नई रणनीति तय कर सकते हैं.
रूपांश पहले भी शांति और बातचीत के पक्ष में बयान दे चुके हैं. उन्होंने इस साल की शुरुआत में उत्तर पश्चिम उप-जोनल ब्यूरो के माध्यम से युद्धविराम का आह्वान करते हुए सरकार से बातचीत शुरू करने की अपील की थी. छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दोनों नेताओं के आत्मसमर्पण को 'लगभग निश्चित' बताया है और कहा है कि यह 'कभी भी हो सकता है.'
यह संभावित आत्मसमर्पण माओवादियों के गढ़ माने जाने वाले अबूझमाड़ में संगठन की पकड़ कमजोर होने का एक और संकेत है, जहां हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों और प्रशासनिक पहुंच के विस्तार ने माओवादी प्रभुत्व को कम किया है.