छत्तीसगढ़: 50 दुर्गम गांवों के 950 से अधिक देवी-देवता पहली बार बस्तर दशहरा में हुए शामिल
नक्सलमुक्त बस्तर में इस बार की विजयादशमी ऐतिहासिक रही. अबुझमाड़, सुकमा और बीजापुर के दुर्गम गांवों से पहुंचे सैकड़ों देवी-देवताओं ने बस्तर दशहरा की रौनक और आस्था को और गहरा बना दिया.
जगदलपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे के बाद इस साल आयोजित बस्तर दशहरा महोत्सव में आस्था का एक नया और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है. वर्षों से नक्सली प्रभाव के कारण कटे रहे करीब 50 अंदरूनी और दूरस्थ गांवों के ग्रामीणों ने इस बार पहली बार अपने स्थानीय देवी-देवताओं के साथ जगदलपुर पहुंचकर उत्सव में भाग लिया.
इस बार अबुझमाड़, सुकमा और बीजापुर के अति-संवेदनशील इलाकों के अलावा पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी भारी संख्या में देवी-देवताओं के प्रतीकों को पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ लाया गया.
अधिकारियों के अनुसार, इस साल के बस्तर दशहरा में जनसैलाब और आस्था का यह समागम अब तक का सबसे बड़ा आयोजन सिद्ध हुआ है. प्रमुख रस्मों में शामिल 'माउली परघाव' में रिकॉर्ड 954 देवी-देवताओं की उपस्थिति दर्ज की गई, जबकि 'भीतर रैनी' रस्म के दौरान 461 देवी-देवता शामिल हुए.
बस्तर के पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने बताया कि सड़कों के बेहतर निर्माण और दूरदराज के क्षेत्रों में शांति बहाल होने से ग्रामीणों की आवाजाही सुगम हुई है. उन्होंने बताया कि जिन 50 गांवों से पहले लोग सुरक्षा कारणों से नहीं आ पाते थे, वहां के ग्रामीण इस बार पूरे उत्साह के साथ पूरे उत्सव के दौरान जगदलपुर में डटे रहे.
स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक, न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की संख्या में भी इस साल अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है. यह ऐतिहासिक बदलाव बस्तर में लौटती शांति और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जन-विश्वास का बड़ा प्रमाण है.