छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खात्म, विकास में योगदान दे रहे पूर्व माओवादी- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू
छत्तीसगढ़ के रायपुर में नुआखाई उत्सव और सेवा सम्मान पर्व के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि केंद्र और राज्य के संयुक्त अभियानों से छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खत्म हो चुका है. पूर्व माओवादी अब मुख्यधारा में शामिल होकर विकास में भागीदारी निभा रहे हैं. उन्होंने युवाओं से 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य को पूरा करने और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का आह्वान किया.
रायपुर । संवाददाता: बलबीर सिंह जुनेजा इंडोर स्टेडियम में आयोजित 'सेवा सम्मान पर्व' और 'युवा प्रबोधन' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्य के निरंतर बदलते माहौल और कृषि परंपराओं की सराहना की. इस दौरान 'छत्तीसगढ़ महतारी की जय' के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा. राष्ट्रपति ने स्पष्ट रूप से कहा कि केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से अब नक्सलवाद का पूरी तरह उन्मूलन हो चुका है और जिस क्षेत्र में कभी डर का साया था, वहां अब विकास का नया सवेरा हुआ है.
कृषि परंपरा और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है नुआखाई
राष्ट्रपति ने कृषि पर्व 'नुआखाई' के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और सामाजिक एकजुटता को मजबूत करने वाला त्योहार बताया. उन्होंने कहा कि यह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि हमारी प्राचीन परंपराओं, आपसी सद्भाव और जीवन मूल्यों को भावी पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है. नई फसल के आगमन पर अन्नदाता के योगदान को नमन करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि भोजन केवल भूख मिटाने का जरिया नहीं, बल्कि किसानों के अथक परिश्रम और धरती की उर्वरा शक्ति का प्रतीक है.
2047 के विकसित भारत के निर्माण में युवाओं की अहम भूमिका
युवाओं से संवाद करते हुए राष्ट्रपति मुर्मू ने उन्हें स्पष्ट लक्ष्य तय कर जीवन में आगे बढ़ने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि आज के युवाओं के पास विज्ञान, प्रौद्योगिकी, खेल, कला और कृषि जैसे हर क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करने के अपार अवसर मौजूद हैं. वर्ष 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के सपने को साकार करने में देश की युवा पीढ़ी ही सबसे प्रमुख भूमिका निभाएगी, इसलिए वे अपनी व्यक्तिगत सफलता को समाज और राष्ट्र की प्रगति से जरूर जोड़ें.
आधुनिकता के साथ सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना जरूरी
संबोधन के अंत में राष्ट्रपति ने आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेजने पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि कोई भी प्रगति तब तक पूर्ण नहीं मानी जा सकती जब तक उसमें मानवीय संवेदनाएं और सामाजिक जिम्मेदारी का भाव शामिल न हो. युवा अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करें और अपनी समृद्ध विरासत को सहेजते हुए देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाएं.