छत्तीसगढ़ HC: संविदा महिला कर्मचारियों को मिलेगा 180 दिन का मातृत्व अवकाश, बर्खास्तगी आदेश रद्द
संविदा पर कार्यरत महिला कर्मचारियों के लिए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से राहत भरी खबर आई है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि संविदा अवधि समाप्त होने के बावजूद महिला कर्मचारियों को 180 दिनों का सवेतन मातृत्व अवकाश पाने का पूरा कानूनी अधिकार है.
बिलासपुर । संवाददाता: संविदा के आधार पर काम कर रही महिला कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और संवेदनशील फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि यदि किसी महिला कर्मी की संविदा अवधि या सेवा समाप्त हो रही हो, तब भी उसे पूरे 180 दिनों के सवेतन मातृत्व अवकाश का कानूनी अधिकार प्राप्त रहेगा.
मुख्य न्यायाधीश कृष्णा राम महापात्र और न्यायाधीश संतोष शर्मा की युगल पीठ ने इस मामले पर निर्णय लेते हुए एकल पीठ के उस पुराने आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें पीड़िता की अर्जी रद्द कर दी गई थी. खंडपीठ ने पीड़िता को तुरंत राहत पहुंचाते हुए उनके खिलाफ जारी बर्खास्तगी पत्र को रद्द करने और नियमानुसार पूरा मातृत्व लाभ देने का निर्देश जारी किया है.
यह पूरा मामला कोरबा स्थित बिसाहूदास महंत मेमोरियल सरकारी मेडिकल कॉलेज से जुड़ा हुआ है. यहां प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग में बतौर सहायक प्रोफेसर संविदा पर कार्यरत डॉ. निकिता श्रीवास्तव, जिनकी नियुक्ति नवंबर 2022 में हुई थी, ने अपनी गर्भावस्था के दौरान मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 का हवाला देते हुए 1 अगस्त 2026 से 28 जनवरी 2027 तक के लिए छुट्टी की अर्जी दी थी.
विभागाध्यक्ष की संस्तुति के बावजूद, कॉलेज प्रबंधन ने अवकाश मंजूर करने के बजाय 6 अगस्त 2026 को उन्हें एक महीने का बर्खास्तगी नोटिस थमा दिया. कॉलेज प्रशासन का कहना था कि जून 2026 में ही उक्त पद पर डॉ. शीला वर्मा की नियमित नियुक्ति हो चुकी है, लिहाजा संविदा समाप्त होने के कारण छुट्टी नहीं दी जा सकती.
जब पीड़िता ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, तो शुरुआत में 8 सितंबर को एकल पीठ से उनकी याचिका खारिज हो गई थी.
इसके बाद मामला युगल पीठ के पास पहुंचा, जहां याचिकाकर्ता के वकील ने उच्चतम न्यायालय के 'डॉ. कविता यादव बनाम सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय' के फैसले की नज़ीर पेश की. सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट तय किया था कि संविदा की अवधि खत्म होने के बाद भी मातृत्व लाभ की तय समय-सीमा प्रभावी रहती है और महिला को इससे अलग नहीं किया जा सकता.
उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलों और तथ्यों की गहन समीक्षा की. अदालत ने पाया कि भले ही नियमित डॉक्टर ने जून में कार्यभार संभाल लिया था, फिर भी कॉलेज प्रशासन ने डॉ. निकिता को अपनी सेवाएं जारी रखने दीं. जब उन्होंने 31 जुलाई को आवेदन दिया, तब वह कार्यरत थीं. ऐसे में आवेदन के बाद बर्खास्तगी नोटिस थमाना पूरी तरह से अवैध है.
अदालत ने 6 अगस्त के बर्खास्तगी नोटिस और 8 सितंबर के एकल पीठ के फैसले को पूरी तरह रद्द करते हुए आदेश दिया कि डॉ. निकिता श्रीवास्तव को आवेदन की तिथि से पूरे 180 दिनों के सवेतन मातृत्व अवकाश सहित संबंधित कानून के तहत मिलने वाले सभी वित्तीय लाभ तत्काल प्रदान किए जाएं.