झीरम घाटी नरसंहार: सभी 10 दोषी माओवादियों को फांसी की सजा
जगदलपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में 13 साल पहले किसी राजनीतिक दल पर हुए सबसे बड़े माओवादी हमले के दोषी 10 लोगों को एनआईए की विशेष अदालत ने फांसी की सज़ा सुनाई है. एनआईए के विशेष की अदालत ने इस कृत्य को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' श्रेणी का मानते हुए यह कड़ा रुख अपनाया है.
इससे पहले अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 5 सितंबर 2026 को ही सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दे दिया था, जिसके बाद आज उनकी सजा का ऐलान किया गया. कानूनी इतिहास में यह पहली बार है जब बस्तर संभाग में नक्सली हमले के इतने बड़े मामले में एक साथ 10 नक्सलियों को फांसी की सजा सुनाई गई है.
सजा पाने वाले दोषियों में प्रमिला मोडियाम, सुमित्रा पुनेम, मुक्का मांडवी, मड़कामी देवा, कोसा कवासी, आयत मरकाम, बंजामी सेना, चैतू लेकाम, जोगा मड़कामी और महादेव नागा शामिल हैं.
झीरम मामले की न्यायिक प्रक्रिया करीब 13 साल चली. सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए. मामले में शुरुआत में 11 आरोपी गिरफ्तार किए गए थे लेकिन सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई. इसके बाद शेष 10 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा जारी रहा. 5 सितंबर को विशेष न्यायाधीश अजय सिंह राजपूत की अदालत ने इन सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया.
एनआईए के वकीलों के मुताबिक, अदालत ने दोषियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 120B (आपराधिक साजिश) और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत दोषी पाया है.
101 गवाह और पुख्ता सबूत बने आधार
लगभग 13 वर्षों तक चली इस लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया के दौरान एनआईए ने अदालत के सामने पुख्ता डिजिटल साक्ष्य, हथियार और दस्तावेज़ पेश किए थे.
इस दौरान कुल 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए, जिन्होंने माओवादियों की क्रूरता और घटनाक्रम को अदालत के सामने बयां किया.
वर्तमान में ये सभी 10 दोषी जगदलपुर के केंद्रीय कारागार में कड़े सुरक्षा पहरे में बंद हैं. नियमों के मुताबिक, दोषियों के पास इस फैसले के खिलाफ छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) में अपील करने के लिए 30 दिनों का समय है
झीरम घाटी हत्याकांड
छत्तीसगढ़ का झीरम घाटी हत्याकांड भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के इतिहास की सबसे दर्दनाक और भीषण नक्सली घटनाओं में से एक है.
यह भयावह घटना 25 मई 2013 को बस्तर जिले के दरभा घाटी क्षेत्र में स्थित झीरम घाटी में घटित हुई थी. उस समय राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र कांग्रेस पार्टी द्वारा 'परिवर्तन यात्रा' निकाली जा रही थी.
जब सुकमा में सभा समाप्त करने के बाद कांग्रेस का काफिला जगदलपुर की ओर लौट रहा था, तभी शाम करीब 4 बजे, पहले से घात लगाकर बैठे लगभग 200 से 300 सशस्त्र नक्सलियों ने बारूदी सुरंग में विस्फोट कर काफिले को रोक दिया और पहाड़ियों के दोनों ओर से अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी.
इस भीषण हमले में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ कांग्रेस की पहली पंक्ति के शीर्ष नेतृत्व को पूरी तरह से समाप्त कर दिया. हमले में कुल 28 लोगों की जान चली गई, जिनमें प्रमुख रूप से तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, बस्तर टाइगर के नाम से प्रसिद्ध पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व विधायक उदय मुदलियार तथा कई सुरक्षाकर्मी एवं कार्यकर्ता शामिल थे.
पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल भी इस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिनका बाद में इलाज के दौरान निधन हो गया.
झीरम घाटी कांड की जांच को लेकर लंबा राजनीतिक और कानूनी घटनाक्रम चला. घटना के तुरंत बाद केंद्र और राज्य सरकार के निर्देश पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने इसकी जांच संभाली. दूसरी ओर न्यायिक आयोग का भी गठन किया गया. बाद में राज्य सरकार द्वारा विशेष जांच दल (SIT) का भी गठन किया गया, लेकिन आपराधिक साजिश के मुख्य पहलुओं को लेकर राजनीतिक बहस बनी रही.
लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद सितंबर 2026 में जगदलपुर स्थित विशेष एनआईए अदालत ने इस हत्याकांड में शामिल 10 आरोपियों को दोषी करार दिया और बुधवार को 10 आरोपियों को मृत्युदंड की सज़ा सुनाई.
तस्वीर- सांकेतिक