छत्तीसगढ़ HC: मूक-बधिर पीड़िता द्वारा गुड़िया और इशारों से दी गई गवाही को माना वैध
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मानवीय संवेदनाओं और न्याय के सिद्धांतों को सर्वोपरि रखते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में यौन उत्पीड़न की शिकार एक मूक-बधिर युवती की गवाही को पूरी तरह वैध और विश्वसनीय करार दिया है. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी को सुनाई गई 'प्राकृतिक मृत्यु तक उम्रकैद' की सजा को बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील को खारिज कर दिया.
इस मामले की खास बात यह रही कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता की शारीरिक अक्षमता को देखते हुए उसके बयान दर्ज करने के लिए एक विशेष प्रदर्शनात्मक पद्धति अपनाई थी, जिसमें एक प्लास्टिक की गुड़िया और प्रशिक्षित दुभाषिए (इंटरप्रेटर) की मदद ली गई थी. हाईकोर्ट ने इस तकनीक को साक्ष्य जुटाने का एक उचित और न्यायसंगत तरीका माना है.
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि केवल इसलिए कि कोई गवाह बोल या सुन नहीं सकता, उसकी गवाही को न तो खारिज किया जा सकता है और न ही उसकी विश्वसनीयता पर संदेह किया जा सकता है.
मामले के विवरण के अनुसार, जुलाई 2020 में पीड़िता के साथ उसके ही एक करीबी रिश्तेदार ने दुष्कर्म किया था. जब पीड़िता की मां काम से घर लौटी, तो उसने अपनी बेटी को बेहद परेशान और रोते हुए पाया.
पीड़िता ने तत्काल इशारों के माध्यम से आरोपी की पहचान की और घटना के बारे में जानकारी दी. जांच के दौरान साइन लैंग्वेज के विशेषज्ञ की मदद से उसके बयान दर्ज किए गए, जो बाद में एफआईआर और ट्रायल के दौरान दिए गए बयानों से पूरी तरह मेल खाते पाए गए.
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी थी कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कानून और तथ्यों के विपरीत है और केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती.
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन तर्कों को सिरे से नकारते हुए कहा कि पीड़िता मानसिक रूप से पूरी तरह सक्षम थी और उसने घटना को पूरी स्पष्टता के साथ संप्रेषित किया.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यौन अपराधों के मामलों में यदि सर्वाइवर की गवाही अटूट और आत्मविश्वास पैदा करने वाली है, तो केवल उसी के आधार पर दोषसिद्धि सुनिश्चित की जा सकती है. अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया है और इस मामले में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है.