छत्तीसगढ़ HC: नाबालिग का पीछा करना और जबरन 'आई लव यू' कहना यौन उत्पीड़न
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा के प्रति कड़ा रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी नाबालिग लड़की का बार-बार पीछा करना और उसकी असहमति के बावजूद उसे 'आई लव यू' कहना केवल साधारण छेड़खानी नहीं, बल्कि पोक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न है. न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की एकल पीठ ने रायपुर की एक निचली अदालत द्वारा वर्ष 2016 में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति, अजीत राव, की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है.
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पीड़िता का बयान पूरी तरह सुसंगत, स्पष्ट और आत्मविश्वास से भरा है, जिससे यह साबित होता है कि आरोपी उसे स्कूल जाते समय रोजाना परेशान करता था और उसके इनकार के बाद भी उसका पीछा करना बंद नहीं किया.
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह मामला जनवरी 2016 का है जब रायपुर जिले की 10वीं कक्षा की एक छात्रा ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उसका पड़ोसी पिछले चार महीनों से उसे लगातार प्रताड़ित कर रहा है. आरोपी न केवल उसका पीछा करता था, बल्कि उसने सार्वजनिक स्थलों जैसे पुलों, पेड़ों और स्कूल की दीवारों पर उनके नाम लिखकर पीड़िता को सार्वजनिक रूप से अपमानित और मानसिक रूप से व्यथित भी किया था.
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि पीड़िता के बयान की पुष्टि उसकी मां और अन्य गवाहों ने भी की है. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि स्कूल रिकॉर्ड के अनुसार घटना के समय लड़की की उम्र लगभग 16 वर्ष थी, इसलिए यह मामला सीधे तौर पर पोक्सो कानून के दायरे में आता है.
कानूनी पहलुओं पर गौर करते हुए अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354(D) के तहत 'स्टाकिंग' के तत्व पूरी तरह मौजूद हैं, क्योंकि आरोपी ने लड़की की स्पष्ट अरुचि के बावजूद उससे संपर्क करने की बार-बार कोशिश की. साथ ही, नाबालिग के प्रति अवांछित यौन टिप्पणी करना पोक्सो एक्ट की धारा 12 के तहत यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आता है.
हालांकि, सजा के निर्धारण में कोर्ट ने न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाते हुए कुछ राहत भी दी. आरोपी द्वारा पिछले 10 वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ने, उसके पूर्व में कोई आपराधिक रिकॉर्ड न होने और मामले के दौरान जेल में बिताए गए समय को देखते हुए, हाईकोर्ट ने उसकी जेल की सजा को 'अब तक काटी गई अवधि' तक सीमित कर दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि जेल की अवधि कम की गई है, लेकिन उस पर लगाया गया जुर्माना और दोषसिद्धि का कलंक बरकरार रहेगा.