छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के हॉस्टल और ट्रांसपोर्ट शुल्क घटाने का आदेश रद्द किया
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रायपुर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और श्री बालाजी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को राहत देते हुए शुल्क कटौती के सरकारी आदेश को खारिज कर दिया है. अदालत ने एएफआरसी को संस्थानों के वास्तविक खर्च और दस्तावेजों की समीक्षा कर फिर से फैसला करने का निर्देश दिया है.
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने दो निजी मेडिकल कॉलेजों के हॉस्टल, मेस और ट्रांसपोर्टेशन शुल्क को कम करने के राज्य सरकार और शुल्क नियामक समिति के पुराने आदेशों को रद्द कर दिया है. अदालत ने पाया कि प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति (एएफआरसी) संस्थानों द्वारा प्रस्तुत वास्तविक खर्चों और वित्तीय रिकॉर्ड्स का सही तरीके से मूल्यांकन करने में विफल रही.
जस्टिस अमितेंद्र किशोर की पीठ ने रायपुर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और श्री बालाजी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सक्षम प्राधिकारी को प्रासंगिक शैक्षणिक सत्रों के लिए वास्तविक छात्र संख्या, हॉस्टल ऑक्यूपेंसी और सुविधाओं पर हुए वास्तविक खर्चों पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि प्राधिकारी को अपने फैसले के समर्थन में स्पष्ट कारण बताने होंगे.
यह मामला तब शुरू हुआ जब एएफआरसी ने अत्यधिक शुल्क वसूली और मुनाफाखोरी की शिकायतों का हवाला देते हुए संस्थानों द्वारा प्रस्तावित शुल्क में भारी कटौती कर दी थी और अतिरिक्त राशि लौटाने का निर्देश दिया था.
उदाहरण के लिए, श्री बालाजी इंस्टीट्यूट ने हॉस्टल और मेस के लिए प्रति वर्ष 3 लाख रुपये तथा ट्रांसपोर्टेशन के लिए 2.5 लाख रुपये का प्रस्ताव रखा था, जिसे समिति ने घटाकर क्रमशः 78,059 रुपये और 13,719 रुपये कर दिया था.
इसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि संशोधित दरों में इंफ्रास्ट्रक्चर, कर्मचारियों के वेतन, बिजली, रखरखाव, ईंधन और स्वच्छता जैसे वास्तविक खर्चों को नजरअंदाज किया गया है. साथ ही गैर-सहायता प्राप्त निजी संस्थानों के प्रस्तावित शुल्क ढांचे को मनमाने ढंग से बदलने के बजाय समिति के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाया गया.
दूसरी ओर, राज्य सरकार और एएफआरसी ने दलील दी थी कि संस्थानों को दस्तावेज जमा करने के कई अवसर दिए गए, लेकिन वे पर्याप्त ब्योरा देने में विफल रहे.
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि केवल सुनवाई का अवसर देना ही काफी नहीं है, बल्कि जमा किए गए वित्तीय दस्तावेजों और साक्ष्यों पर सही तरीके से विचार किया जाना चाहिए.
अदालत ने जोर देकर कहा कि अतिरिक्त शुल्क वसूली और रिफंड से जुड़े किसी भी फैसले में पेश किए गए साक्ष्यों और निकाले गए निष्कर्षों के बीच एक तार्किक संबंध होना चाहिए. प्राधिकारी को यह स्पष्ट करना होगा कि वह संस्थानों के वित्तीय ब्योरे को क्यों स्वीकार या अस्वीकार कर रहा है.