रवि, 18 अक्टू. 2026

CGKhabar

HC ने भतीजी से रेप के दोषी की सजा को कम किया

C

CG Khabar

28 अग. 2025, 06:02 PM 4 मिनट में पढ़ें 2

हाईकोर्ट
हाईकोर्ट

बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति की सजा को संशोधित किया है, जिस पर अपनी भतीजी के साथ जबरन यौन संबंध बनाने का आरोप था. पीड़िता ने अपने पिता द्वारा यौन शोषण के बाद अपने फूफा (आरोपी) के घर शरण ली थी. कोर्ट ने यह फैसला इस आधार पर लिया कि पीड़िता की नाबालिग होने की स्थिति को साबित करने के लिए कोई पुख्ता या कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है.


न्यायमूर्ति रजनी दुबे और अमितेंद्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने दोषसिद्धि को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(3) (16 वर्ष या 18 वर्ष से कम उम्र की महिला के साथ बलात्कार) से बदलकर धारा 376(2)(f) (रिश्तेदार द्वारा बलात्कार) कर दिया और सजा को आजीवन कारावास से घटाकर 10 वर्ष के कारावास तक सीमित कर दिया. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा: “…यह स्पष्ट है कि अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की उम्र के संबंध में कोई पुख्ता और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत पेश नहीं किया है, जो यह साबित कर सके कि घटना के दिन पीड़िता नाबालिग थी. फिर भी, निचली अदालत ने अपने फैसले में उसे नाबालिग माना. इसलिए, हम निचली अदालत के उस निष्कर्ष को रद्द करते हैं, जिसमें कहा गया था कि घटना के दिन पीड़िता 16 या 18 वर्ष से कम उम्र की थी.”

विज्ञापन


20 दिसंबर, 2018 को पीड़िता ने प्राथमिकी दर्ज की थी, जिसमें बताया गया कि उसके माता-पिता के अलग होने के बाद वह अपने पिता और बहन के साथ रहती थी. 5 दिसंबर, 2018 को, जब वह सो रही थी, उसके पिता ने उसके साथ जबरन यौन संबंध बनाए. इस घटना की जानकारी मिलने पर उसकी बुआ ने उसके पिता को फटकार लगाई और पीड़िता को अपने घर ले गई.


15 दिसंबर, 2018 की रात को, जब पीड़िता सो रही थी, उसके फूफा (आरोपी) ने उसके कपड़े उतारकर जबरन यौन संबंध बनाए. पीड़िता ने विरोध किया, लेकिन आरोपी नहीं रुका. पीड़िता ने यह घटना अपनी मौसी को बताई, जिसके बाद उसकी मां को सूचित किया गया और प्राथमिकी दर्ज की गई.


आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया और जांच पूरी होने के बाद उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई. निचली अदालत ने आरोपी को धारा 376(3) के तहत दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई. इसके खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील की.


हाई कोर्ट ने पीड़िता की नाबालिग होने की स्थिति की जांच की. स्कूल रजिस्टर में पीड़िता की जन्मतिथि का उल्लेख था, लेकिन स्कूल प्रिंसिपल ने स्वीकार किया कि वह उस समय स्कूल में तैनात नहीं थीं, जब पीड़िता ने दाखिला लिया था, और रजिस्टर में हस्ताक्षर उनकी लिखावट में नहीं थे. इसके अलावा, पीड़िता ने अपनी उम्र 14 वर्ष बताई और उसकी मां ने जन्मतिथि 05.06.2005 बताई, लेकिन इन दावों को किसी स्वीकार्य सबूत से पुष्ट नहीं किया गया. इसलिए, कोर्ट ने निचली अदालत के नाबालिग होने के निष्कर्ष को रद्द कर दिया.


पीड़िता के बयान, जो उसकी बहन, मौसी और मां जैसे गवाहों के बयानों से पुष्ट हुए, के आधार पर कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने यह साबित कर दिया कि आरोपी ने यह जघन्य कृत्य किया. आरोपी ने प्राथमिकी दर्ज करने में देरी का हवाला देकर अभियोजन पक्ष की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया, लेकिन कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के स्पष्टीकरण को स्वीकार कर लिया.


कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के समय पीड़िता 16 या 18 वर्ष से कम उम्र की थी. इसलिए, धारा 376(3) और POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत अपराध साबित नहीं हुआ. हालांकि, धारा 376(2)(f) के तहत अपराध सिद्ध हुआ, जिसके लिए न्यूनतम सजा 10 वर्ष है. इस प्रकार, आरोपी की सजा को संशोधित कर 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP