पुलिस हिरासत में मौत: HC ने 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने धमतरी जिले में पुलिस हिरासत में एक व्यक्ति की मौत के मामले में राज्य सरकार को उसके परिवार को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है. अदालत ने कहा कि ऐसी घटनाएं संवैधानिक शासन में जनता के विश्वास को हिला देती हैं.
यह मामला दुर्गेंद्र कठोलिया (41) का है, जो राजनांदगांव जिले का निवासी था. 29 मार्च को धमतरी जिले में कथित जालसाजी के आरोप में पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था. 31 मार्च को उसे कोर्ट में पेश किया गया, जहां उसे पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया. उसी शाम कोर्ट से लौटने के बाद पुलिस स्टेशन में ही उसकी मौत हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसके शरीर पर 25 से 30 चोटों का उल्लेख था, जो तीसरी डिग्री यातनाओं की ओर इशारा करती हैं.
मृतक की पत्नी दुर्गा देवी कठोलिया और माता-पिता ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. याचिकाकर्ताओं के वकील ने बताया कि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी के समय कठोलिया पूरी तरह स्वस्थ था, लेकिन तीन घंटे बाद ही पुलिस स्टेशन में मृत पाया गया.
उन्होंने सीबीआई जांच और परिवार को मुआवजे की मांग की.
उप महाधिवक्ता शशांक ठाकुर ने राज्य और पुलिस का पक्ष रखते हुए कहा कि कठोलिया ने धमतरी जिले के 47 किसानों को ठगकर लगभग 7.73 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया था.
पोस्टमार्टम में चोटें तो दर्ज हुईं, लेकिन मेडिकल बोर्ड ने इन्हें साधारण और 3 से 6 दिन पुरानी बताया, जो मौत का कारण नहीं हो सकतीं. मौत का कारण श्वासावरोध से कार्डियोरेस्पिरेटरी अरेस्ट था.
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभू दत्ता गुरु शामिल थे, ने 6 अक्टूबर को पारित आदेश में कहा कि सरकार ने मौत के प्राकृतिक होने या हिरासत से असंबंधित होने का कोई प्रमाण नहीं दिया. चोटों की मौजूदगी और कोई स्पष्ट व्याख्या न होने से यह स्पष्ट है कि मौत हिरासत में हिंसा और पुलिस अत्याचार का परिणाम है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है.
अदालत ने जोर देकर कहा कि हिरासत में मौतें और पुलिस अत्याचार आपराधिक न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास की नींव को कमजोर करते हैं. हर ऐसी घटना कानून प्रवर्तन तंत्र की विश्वसनीयता को घटाती है. राज्य को मुआवजा देना पड़ता है, जो परिवार को राहत देने के साथ-साथ भविष्य के उल्लंघनों के लिए निवारक का काम करता है.
अंत में, कोर्ट ने राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर मृतक की पत्नी को (उनके और दो नाबालिग बच्चों के लिए) 3 लाख रुपये, तथा माता-पिता को प्रत्येक को 1 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया.
भारत में हिरासत मौतों के अन्य प्रमुख मामले (2025)
भारत में हिरासत मौतें एक गंभीर समस्या बनी हुई हैं. 2025 में अनुमानित 110 ऐसी मौतें दर्ज की गई हैं, जिसमें महाराष्ट्र सबसे आगे है. यहां कुछ हालिया प्रमुख मामलों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है, जो सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों के फैसलों से जुड़े हैं:
1. मध्य प्रदेश हिरासत मौत मामला
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगाई जब दो पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी में देरी हुई. यह मामला एक हिरासत मौत से जुड़ा था, जहां आरोपी पुलिसकर्मी फरार थे. अदालत ने सीबीआई और राज्य सरकार से देरी की सफाई मांगी और अंततः दोनों को गिरफ्तार करवाया. यह घटना पुलिस जवाबदेही पर सवाल उठाती है.
2. तमिलनाडु किशोर की हिरासत मौत
तमिलनाडु में एक किशोर की पुलिस हिरासत में मौत के मामले में चार पुलिसकर्मियों को 11 वर्ष की सजा सुनाई गई. यह सितंबर 2025 का फैसला था, जो तीसरी डिग्री यातनाओं के खिलाफ मजबूत संदेश देता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी सीबीआई की लापरवाही पर टिप्पणी की.
3. मुंबई हिरासत मौत: अल्टाफ कादिर मामला
मुंबई में 29 वर्षीय अल्टाफ कादिर की अवैध हिरासत और यातनाओं से मौत के मामले में दो पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया. विशेष सीबीआई कोर्ट ने 8 अक्टूबर 2025 को फैसला सुनाया, जिसमें कानून की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए. यह मामला पुलिस अत्याचार की गंभीरता को उजागर करता है.
4. उत्तराखंड में महामारी विज्ञान अध्ययन
ऋषिकेश के एक तृतीयक चिकित्सा संस्थान में 2020 से मई 2025 तक 34 हिरासत मौतें दर्ज की गईं, जिनमें 2023 में सबसे अधिक (10) मामले थे. अधिकांश पीड़ित पुरुष थे, जो व्यवस्थागत कमियों की ओर इशारा करता है.
ये मामले दर्शाते हैं कि हिरासत मौतें पूरे देश में फैली हुई हैं और न्यायिक हस्तक्षेप से ही सुधार संभव है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार, 2024 में 2,739 ऐसी मौतें हुईं, जो 2023 के 2,400 से अधिक हैं.