छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा-संदेह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता
छत्तीसगढ़ HC "संदेह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता"
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2016 के उस बस्तर ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें दो लोगों को टिफिन बम रखने और प्रतिबंधित माओवादी संगठन के सक्रिय सदस्य होने के आरोप से बरी किया गया था. कोर्ट ने कहा कि "संदेह, चाहे कितना भी मजबूत हो, प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता."
जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की खंडपीठ ने मुचाकी देवा (38) और विज्जा पोडयामी (35) की बरी के खिलाफ राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया.
दोनों पर छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2005 और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 के तहत मामला दर्ज किया गया था.
अभियोजन पक्ष के अनुसार, सितंबर 2015 में बस्तर के भद्रीमाहु गांव के पास तलाशी अभियान के दौरान दोनों को पकड़ा गया था और उनके बयानों के आधार पर विस्फोटक उपकरण बरामद किए गए थे.
हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने जब्ती प्रक्रिया में विरोधाभास पाया और यह भी नोट किया कि जब्त सामग्री के विस्फोटक होने की पुष्टि के लिए कोई एफएसएल रिपोर्ट नहीं थी.
हाईकोर्ट ने गवाहों के बयानों की जांच के बाद जांच अधिकारी और दो जब्ती गवाहों के बयानों में "महत्वपूर्ण विरोधाभास और चूक" पाई. कोर्ट ने जब्ती के स्थान के बारे में असंगतियों को नोट किया और पुष्टि की कि सभी जब्ती दस्तावेज पुलिस स्टेशन में हस्ताक्षरित किए गए थे, न कि घटनास्थल पर.
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों को कथित विस्फोटकों से जोड़ने वाला ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा. "पूरा मामला संदेह पर आधारित था, लेकिन संदेह प्रमाण का विकल्प नहीं बन सकता," फैसले में कहा गया.
ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को "उचित और न्यायसंगत" मानते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है, और इस तरह राज्य की अपील खारिज कर दी गई.