छत्तीसगढ़: 25 दिनों में हाथी के 4 शावकों की मौत संक्रमण के
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के जंगलों में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर वन विभाग अब पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ गया है. रायगढ़ और धरमजयगढ़ वन मंडलों में हाथियों की सुरक्षा व्यवस्था को पहले से कहीं अधिक कड़ा कर दिया गया है. जंगलों में विचरण कर रहे हाथियों पर पैनी नजर रखने के लिए अब आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है. वनकर्मियों और हाथी मित्र दलों की मुस्तैदी के साथ-साथ अब आसमान से भी निगरानी की जा रही है.
अधिकारियों के मुताबिक, दिन के समय सामान्य ड्रोन और संवेदनशील इलाकों में ट्रैप कैमरों का उपयोग किया जा रहा है, जबकि रात के अंधेरे में हाथियों की सटीक लोकेशन और उनकी गतिविधियों को ट्रैक करने के लिए विशेष रूप से थर्मल ड्रोन तैनात किए गए हैं ताकि किसी भी संकट का समय रहते पता लगाया जा सके.
इस हाई-टेक चौकसी के पीछे हाल ही में सामने आई वन्यजीवों की मौत की एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट है. दरअसल, मई और जून के शुरुआती दिनों के भीतर करीब 25 दिनों के अंतराल में चार हाथी शावकों ने दम तोड़ दिया था. ये सभी शावक एक ही दल का हिस्सा थे और इनके शव जल स्रोतों के समीप पाए गए थे.
इस रहस्यमयी घटना के बाद वन विभाग ने बेहद गंभीरता दिखाते हुए विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की देखरेख में शवों का पोस्टमॉर्टम कराया था. इसके बाद विसरा और अन्य जरूरी सैंपल्स को जांच के लिए बरेली और देहरादून की एडवांस लैबोरेट्रीज में भेजा गया था, जहां से आई विस्तृत रिपोर्ट ने अब मौतों की असली वजहों से पर्दा उठा दिया है.
प्रयोगशाला से आई मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक, हाथी शावकों की असमय मौत के पीछे कोई बाहरी हमला या जहर नहीं, बल्कि जानलेवा बीमारियां थीं. जांच में पुष्टि हुई है कि एक शावक गंभीर रूप से हेपेटाइटिस (लिवर के संक्रमण) से पीड़ित था, जबकि दूसरे शावक के शरीर में सेप्टीसीमिया (रक्त का गंभीर संक्रमण) फैल चुका था. इससे पहले एक अन्य शावक की मौत के पीछे निमोनिया को जिम्मेदार पाया गया था.
विशेषज्ञों का कहना है कि ये बीमारियां वन्यजीवों के आंतरिक अंगों को तेजी से नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे कम उम्र के शावक सर्वाइव नहीं कर पाए. वर्तमान में इन दोनों वन क्षेत्रों में कुल 137 हाथी मौजूद हैं, जिनमें 37 नर और 62 मादा हाथियों के अलावा 35 छोटे शावक शामिल हैं, जिनकी सुरक्षा अब सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है.
इस संकट से निपटने और भविष्य में ऐसे संक्रमणों को फैलने से रोकने के लिए रायगढ़ में एक दो-दिवसीय विशेष कार्यशाला और प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया. डीएफओ जितेंद्र उपाध्याय ने बताया कि इस बैठक में देश के कई राज्यों से आए शीर्ष वन्यजीव वैज्ञानिकों और पशु चिकित्सकों ने हिस्सा लिया.
दो दिनों तक चले इस मंथन में मैदानी अधिकारियों और वनकर्मियों को हाथियों में होने वाले विभिन्न संक्रमणों की पहचान, उनके लक्षण और त्वरित उपचार के तरीकों की बारीकियां सिखाई गईं. विभाग अब वैज्ञानिकों से मिले इन महत्वपूर्ण सुझावों के आधार पर एक ठोस और दीर्घकालिक कार्ययोजना तैयार कर रहा है, ताकि छत्तीसगढ़ के जंगलों में हाथियों के कुनबे को पूरी तरह सुरक्षित और सेहतमंद रखा जा सके. File Photo.