बेबुनियाद व्यभिचार का आरोप क्रूरता- हाईकोर्ट
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पत्नी के चरित्र पर बेबुनियाद आरोप लगाना मानसिक क्रूरता है और इस तरह का व्यवहार पत्नी को अलग रहने का पर्याप्त कारण देता है.
जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विजयकुमार रामचंद्र भाटे बनाम नीला विजयकुमार भाटे मामले के फैसले का हवाला देते हुए पति की तलाक याचिका को खारिज कर दिया.
पति ने फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 19(1) के तहत अपील दायर की थी, जिसमें रायगढ़ के फैमिली कोर्ट के 17 मार्च 2022 के फैसले को चुनौती दी गई थी. फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत पति की तलाक याचिका को खारिज किया था.
पति ने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी का उनके जीजा के साथ अवैध संबंध था. उन्होंने दावा किया कि पत्नी अक्सर बिना बताये घर छोड़कर जीजा के साथ समय बिताती थी और बाद में बच्चों सहित वैवाहिक घर छोड़कर चली गई.
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि व्यभिचार के आरोप को साबित करने के लिये कोई ठोस सबूत नहीं थे. पति ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में स्वीकार किया कि उन्होंने अपने जीजा के खिलाफ कोई आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं की थी और न ही कोई रिकॉर्डिंग या इलेक्ट्रॉनिक सबूत पेश किया. गवाह भी कथित अवैध संबंध को साबित करने में विफल रहे.
कोर्ट ने यह भी पाया कि पत्नी को पति और ससुराल वालों से दहेज की मांग और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था. इन परिस्थितियों के बावजूद पत्नी की शादी को बनाये रखने की इच्छा ने उनकी विश्वसनीयता को और मजबूत किया.
कोर्ट ने कहा, "रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों से स्पष्ट है कि पति ने पत्नी के चरित्र पर बेबुनियाद आरोप लगाये, जिसमें उनके जीजा के साथ संबंध का दावा भी शामिल है. इस तरह के अप्रमाणित आरोप मानसिक क्रूरता के समान हैं."
अपील को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी के पास अलग रहने का उचित और पर्याप्त कारण था, और फैमिली कोर्ट का फैसला साक्ष्यों के उचित मूल्यांकन और संभावनाओं के संतुलन पर आधारित था.
खंडपीठ ने कहा, "फैमिली कोर्ट के फैसले और डिक्री में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता." इसके साथ ही अपील को खारिज कर दिया गया.