30 साल पुराने आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने पर सीधे सेवा से नहीं हटाया जा सकता: HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में लोक सेवा में चरित्र सत्यापन को लेकर राज्य सरकार के यांत्रिक रुख पर कड़ी फटकार लगाई है. अदालत ने कॉलेज के एक सहायक प्राध्यापक (कॉमर्स) की सेवा समाप्ति के आदेश को पूरी तरह से रद्द करते हुए उन्हें तुरंत बहाल करने का निर्देश दिया है. प्राध्यापक पर आरोप था कि उन्होंने अपनी नियुक्ति के समय दो दशक से अधिक पुराने आपराधिक मामलों की जानकारी सत्यापन पत्र में नहीं दी थी.
बिना विचार किए यांत्रिक तरीके से बर्खास्तगी गलत
न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि नियोक्ता के पास चरित्र और पूर्ववृत्त की जांच करने का अधिकार अवश्य है, लेकिन इसका प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि जब कोई मामला वर्षों पूर्व बरी हो चुका हो, तो केवल जानकारी न देने के आधार पर किसी कर्मचारी को नौकरी से निकालना अनुचित है. प्राधिकारी को कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले कर्मचारी की उस समय की आयु, अपराध की प्रकृति, शैक्षणिक योग्यता और उसकी दी गई सेवाओं का समग्र मूल्यांकन करना चाहिए था.
17 साल की उम्र के मामले और दो दशक की बेदाग सेवा
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, याचिकाकर्ता हीरा प्रसाद यादव को वर्ष 2018 में शासकीय राजमोहिनी देवी कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अंबिकापुर में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्त किया गया था. वर्ष 1994 में, जब वे महज 17 वर्ष के स्कूली छात्र थे, तब उनके खिलाफ दो आपराधिक मामले दर्ज हुए थे. इनमें से एक मामले में वे 1995 और दूसरे में 1997 में ही पूरी तरह बरी हो चुके थे. इसके बाद उन्होंने एम.कॉम., एम.फिल. और पीएच.डी. की उच्च शिक्षा प्राप्त की और पिछले छह वर्षों से अधिक समय से बेदाग सेवा दे रहे थे.
सरकार की दलीलें खारिज, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि जानकारी छिपाना अपने आप में एक गंभीर अनियमितता है और बाद में दिया गया हलफनामा पुरानी घोषणा को सही नहीं ठहरा सकता. हालांकि, हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए राज्य के इस तर्क को खारिज कर दिया. अदालत ने माना कि उच्च शिक्षा विभाग के सचिव द्वारा जारी 17 फरवरी 2025 का बर्खास्तगी आदेश बिना दिमाग लगाए और यांत्रिक रूप से पारित किया गया था.
अदालत का अंतिम फैसला और बहाली के निर्देश
अदालत ने याचिकाकर्ता की बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त करते हुए राज्य सरकार को उन्हें तत्काल सेवा में बहाल करने का हुक्म दिया. हाईकोर्ट ने यह भी तय किया है कि याचिकाकर्ता को उनकी वरिष्ठता के लिए सेवा की निरंतरता का लाभ मिलेगा, हालांकि सेवा से बाहर रहे मध्यवर्ती काल का कोई पिछला वेतन (अरियर) देय नहीं होगा.