भारत में कैंसर का इलाज 75% सस्ता: चीनी दवाओं ने दी बड़ी राहत
नई दिल्ली । डेस्क: भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र, विशेष रूप से ऑन्कोलॉजी (कैंसर विज्ञान) में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखा जा रहा है, जहाँ चीन में विकसित आधुनिक दवाओं के आगमन ने इलाज की वित्तीय बाधाओं को काफी हद तक कम कर दिया है. वर्तमान में भारत में कैंसर के मरीजों को अक्सर 'वित्तीय विषाक्तता' का सामना करना पड़ता है, जहाँ इलाज का खर्च परिवारों को भारी कर्ज में डुबो देता है.
इस स्थिति के बीच, भारतीय और चीनी दवा कंपनियों के बीच बढ़ते गठजोड़ ने एक नई उम्मीद जगाई है. विशेषज्ञों का कहना है कि जहाँ पश्चिमी मूल की इम्यूनोथेरेपी दवाओं के एक सत्र की लागत लाखों में होती है, वहीं चीनी नवाचार और भारतीय वितरण मॉडल के समन्वय से अब वही उपचार लगभग 75% तक कम कीमत पर उपलब्ध हो रहा है.
प्रमुख अस्पतालों के कैंसर विशेषज्ञों का अनुभव बताता है कि ये कम लागत वाली दवाएं नैदानिक प्रभावशीलता के मामले में किसी भी तरह से पीछे नहीं हैं. ये दवाएं भारतीय विनियामक संस्थाओं द्वारा पूरी तरह से जांची गई हैं और मानक फेज़-3 नैदानिक परीक्षणों के सफल परिणामों के बाद ही बाजार में उतारी गई हैं.
भारतीय फार्मा जगत की दिग्गज कंपनियां जैसे ग्लेनमार्क, डॉ. रेड्डीज, ज़ायडस और इन्टास फार्मा ने प्रमुख चीनी बायोटेक फर्मों के साथ अरबों डॉलर के लाइसेंसिंग सौदे किए हैं. इन समझौतों के माध्यम से फेफड़ों के कैंसर, स्तन कैंसर और पेट के कैंसर जैसी गंभीर स्थितियों के लिए अत्याधुनिक उपचार अब भारतीय मरीजों की पहुँच में आ रहे हैं.
यह बदलाव न केवल उपचार को किफायती बना रहा है, बल्कि उन नकली या अवैध दवाओं के बाजार पर भी लगाम लगा रहा है जो अक्सर महंगे विकल्पों के अभाव में मरीजों तक पहुँच जाती थीं.
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दशक में यह सहयोग भारत में कैंसर देखभाल की पूरी रूपरेखा बदल देगा, जिससे जीवन रक्षक उपचार केवल अमीरों तक सीमित न रहकर आम आदमी के लिए भी सुलभ हो सकेगा.