सोम, 19 अक्टू. 2026

CGKhabar

शादी का वादा टूटना हर मामले में रेप नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

C

CG Khabar

28 अप्रै. 2026, 09:16 AM 3 मिनट में पढ़ें 3

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि शादी के वादे से मुकर जाना हर परिस्थिति में बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता है. जस्टिस रजनी दुबे की एकल पीठ ने एक व्यक्ति की सजा को रद्द करते हुए टिप्पणी की कि जब तक यह साबित न हो जाए कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के इरादे से दिया गया था, तब तक इसे आईपीसी की धारा 376 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता. 


अदालत ने यह फैसला उस याचिका पर सुनाया जिसमें आरोपी ने निचली अदालत द्वारा उसे दोषी ठहराए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी. मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, आरोपी और पीड़िता के बीच वर्ष 2004 से 2006 तक यानी करीब तीन वर्षों तक प्रेम संबंध थे और इस दौरान उनके बीच लगातार शारीरिक संबंध भी बने. 

विज्ञापन


जब पीड़िता गर्भवती हुई और उसने एक बच्चे को जन्म दिया, तब गांव की बैठक में आरोपी द्वारा शादी से इनकार करने के बाद यह मामला पुलिस तक पहुंचा और प्राथमिकी दर्ज की गई.


सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि पीड़िता की सहमति किसी धोखे या दबाव में ली गई थी. पीड़िता ने स्वयं स्वीकार किया कि वह आरोपी से प्रेम करती थी और उनके बीच लंबे समय तक स्वैच्छिक संबंध रहे. 


अदालत ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि पीड़िता ने शिकायत तभी दर्ज कराई जब आरोपी ने शादी करने से मना कर दिया, जो यह दर्शाता है कि संबंध आपसी सहमति पर आधारित थे. 

आयु के विवाद पर कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष पीड़िता के नाबालिग होने का कोई भी ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य प्रमाण पेश नहीं कर सका, जिसके चलते उसे वयस्क मानकर ही तथ्यों का मूल्यांकन किया गया.


अदालत ने साक्ष्यों की कमी को रेखांकित करते हुए यह भी कहा कि इस मामले में बच्चे का डीएनए टेस्ट नहीं कराया गया था और जन्म रजिस्टर में पिता का नाम केवल पीड़िता के बयानों के आधार पर दर्ज था, जिसे कानून की नजर में पुख्ता सबूत नहीं माना जा सकता. 


जस्टिस रजनी दुबे ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन के मामले में मौजूद ये तमाम विसंगतियां और कमियां आरोपी के पक्ष में काम करती हैं और उसे 'संदेह का लाभ' मिलना अनिवार्य है. 


हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी की नियत शुरू से ही धोखा देने की थी या उसने जबरदस्ती संबंध बनाए थे, इसलिए निचली अदालत का सजा सुनाने का फैसला कानूनन सही नहीं है. इसी आधार पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी करते हुए उसकी दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया है.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP