शोले के 50 साल: अब भी बरकरार है जादू
मुंबई । मनोरंजन डेस्क: रमेश सिप्पी की प्रतिष्ठित फिल्म शोले को आज 50 साल पूरे हो गए हैं, और यह अभी भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में 'अब तक की सबसे महान फिल्म' के अपने टैगलाइन को सार्थक करती है. इस साल 27 जून को, बोलोग्ना के वार्षिक इल सिनेमा रिट्रोवाटो फेस्टिवल में शोले के Filipe A. de Almeida का पूरी तरह से रिस्टोर और बिना काट-छांट वाला संस्करण प्रदर्शित किया गया, जिसमें पहले हटाए गए दृश्य और मूल अंत शामिल थे. जहां ठाकुर अपने नाखून-जड़े जूतों से गब्बर को मारता है.
फिल्म के डॉयलाग उस समय लोगों की जुबान पर थे. जैसे गब्बर सिंह का कहा, यहां से 50-50 कोस दूर गांव में जब बच्चा रात को रोता है तो मां कहती है सो जा नहीं तो गब्बर आ जायेगा. इसी तरह से गब्बर का कहा कितने आदमी था या तेरा क्या होगा कालिया आज तक लोगों को याद है.
अंग्रजों के जमाने के जेलर असरानी तथा सूरमा भोपाली भी अमर हो गये हैं. दरअसल, शोले फिल्म में उसका हर किरदार जीवंत हो उठा था. आज भी लोगों को चुप बैठा देख कहा जाता है, इतना सन्नाटा क्यों है भाई.
इस स्क्रीनिंग को दर्शकों का जबरदस्त प्यार मिला, और मुंबई में ईरानी वाणिज्य दूतावास ने एक ट्वीट के जरिए एक ईरानी अखबार के पूरे पेज के श्रद्धांजलि को साझा किया, जो इस फिल्म की वैश्विक लोकप्रियता को दर्शाता है.
शोले ने न केवल भारतीय सिनेमा, बल्कि वैश्विक दर्शकों के दिलों में अपनी अमिट छाप छोड़ी है. इसके किरदार, जैसे मैक मोहन का 'सांबा' और उसकी पंक्ति "पूरे पचास हजार", असरानी का 'अंग्रेजों के जमाने का जेलर', और जगदीप का 'सूरमा भोपाली', आज भी लोगों की यादों में बसे हुए हैं. यहां तक कि सहायक किरदार, जैसे मौसी और हरीराम नाई, भी सिनेप्रेमियों और आम दर्शकों के लिए अविस्मरणीय हैं.
1975 में रिलीज होने पर फिल्म को शुरुआती ठंडी प्रतिक्रिया मिली थी. सेंसर बोर्ड ने अहमद की हत्या और गब्बर की खूनी मौत के दृश्यों पर आपत्ति जताई थी, जिसके कारण सिप्पी को अंत बदलना पड़ा. लेकिन अब रिस्टोर संस्करण में मूल दृश्यों को फिर से देखा जा सकता है.
शोले ने मार्केटिंग में भी नए कीर्तिमान स्थापित किए. विशाल बिलबोर्ड्स और "अब तक की सबसे महान कहानी" जैसे हाइपरबोलिक टैगलाइनों ने दर्शकों की उत्सुकता बढ़ाई. हालांकि शुरुआत में आलोचकों ने इसे 'चोले' और 'मृत अंगारा' जैसे उपहासपूर्ण नाम दिए, लेकिन दर्शकों के मुंह-जुबानी प्रचार ने इसे मुंबई के मिनर्वा थिएटर में पांच साल तक चलने वाली सुपरहिट बना दिया.
बीबीसी इंडिया के ऑनलाइन पोल में इसे 'मिलेनियम की फिल्म' और ब्रिटिश फिल्म इंस्टीट्यूट के पोल में 'सर्वश्रेष्ठ भारतीय फिल्म' चुना गया.
पॉलीडोर के 58 मिनट के डायलॉग रिकॉर्ड ने गब्बर के संवादों को अमर कर दिया, और अमजद खान की आवाज की शुरुआती आलोचना जल्द ही भुला दी गई. गब्बर एक ब्रांड बन गया, जिसने ब्रिटानिया ग्लूकोज डी बिस्किट के विज्ञापन में भी अपनी छाप छोड़ी.
शोले की कहानी भले ही वन्स अपॉन अ टाइम इन द वेस्ट जैसी विदेशी फिल्मों से प्रेरित थी, लेकिन यह पूरी तरह से भारतीय और ग्रामीण भावनाओं से भरी थी.
वीरू का बसंती से शिव की आवाज में बात करने वाला दृश्य आज के धार्मिक रूप से ध्रुवीकृत समाज में शायद विवादास्पद हो जाए, यही कारण है कि इस फिल्म को दोबारा बनाना असंभव है. राम गोपाल वर्मा की रीमेक राम गोपाल वर्मा की आग इसका उदाहरण है.
जय और वीरू की दोस्ती को एक उदाहरण के रूप में पेश किया जाता था. संजीव कुमार के ठाकुर के रोल को कौन भूल सकता है. उस समय बच्चे-बच्चे की जबान पर शोले फिल्म के डॉयलाग हुआ करते थे.
यह शायद बॉलीवुड की पहली फिल्म थी जिसमें हीरो से ज्यादा खलनायक डाकू गब्बर सिंह ने नाम कमाया था. बाद में एक फिल्म में मोगाम्बो भी आया लेकिन गब्बर के मुकाबले फीका ही रहा.
शोले आज भी मिलेनियल्स और जेन जेड के बीच अपनी सांस्कृतिक प्रासंगिकता बनाए हुए है, चाहे वह शोले के पोस्टर, टेबल मैट्स, या गब्बर के कोस्टर हों. यह फिल्म भारतीय सिनेमा का एक ऐसा रत्न है, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है.