भरतबाला की ‘रामनामी’ को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय की अनूठी आस्था, संघर्ष और सांस्कृतिक पहचान को पर्दे पर उतारने वाली फिल्मकार भरतबाला की डॉक्यूमेंट्री ‘रामनामी’ ने देश का प्रतिष्ठित 72वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल किया है. फिल्म को श्रेष्ठ वृत्तचित्र श्रेणी में सम्मानित किया गया.
गुजरात के एकता नगर में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की तलहटी में आयोजित पुरस्कार समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने फिल्मकार भरतबाला को यह सम्मान प्रदान किया.
‘रामनामी’ छत्तीसगढ़ के मध्य और उत्तरी इलाकों में बसे उस समुदाय की कहानी सामने लाती है, जिसकी भक्ति केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके शरीर, जीवन और पहचान का हिस्सा बन चुकी है. फिल्म राम नाम के प्रति इस समुदाय की गहरी आस्था और उस आस्था के पीछे छिपे सामाजिक संघर्ष को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है.
फिल्म में प्रसिद्ध गायक और संगीतकार कैलाश खेर की आवाज ने कहानी को एक विशिष्ट भावनात्मक आयाम दिया है. उन्होंने ‘राम ही पार लगावेंगे’ गीत के माध्यम से रामनामी समुदाय की आस्था को स्वर दिया. यह सहयोग भी एक संयोग से शुरू हुआ था. शूटिंग से पहले एयरपोर्ट पर हुई एक बातचीत के दौरान भरतबाला और कैलाश खेर की मुलाकात हुई, जिसके बाद खेर फिल्म का अभिन्न हिस्सा बन गए. गीत की पंक्तियां- ‘बाहर राम, भीतर राम, मोरा रोम-रोम राम ही राम’ रामनामी समुदाय की उस भावना को अभिव्यक्त करती हैं, जिसमें राम नाम उनके लिए जीवन के प्रत्येक कण में रचा-बसा है.
राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर भरतबाला ने इसे अपनी फिल्म की उपलब्धि से आगे बढ़कर रामनामी समुदाय और उनकी जीवंत परंपराओं की पहचान बताया. उन्होंने कहा कि इस समुदाय ने उन्हें अपनी दुनिया में प्रवेश करने और अपनी कहानी कहने का अवसर दिया. उनके अनुसार, रामनामी समुदाय की कहानी आस्था, संघर्षशीलता और मानवीय गरिमा की कहानी है.
भरतबाला ने कहा कि वृत्तचित्र निर्माण मूल रूप से ‘सुनने की कला’ है. उनके लिए कैमरे के माध्यम से उन आवाजों, स्मृतियों और जीवन-शैलियों को संरक्षित करना महत्वपूर्ण है, जो सामूहिक चेतना का हिस्सा बने रहने योग्य हैं. उन्होंने इस सम्मान को रामनामी समुदाय और छत्तीसगढ़ के उन लोगों को समर्पित किया, जिन्होंने अपनी कहानियां उन पर भरोसा करके साझा कीं.
भेदभाव के खिलाफ आस्था का अनूठा प्रतीक
‘रामनामी’ की कहानी करीब 1890 के आसपास शुरू होती है. कहा जाता है कि परसुराम भारद्वाज नाम के एक दलित व्यक्ति को जातिगत भेदभाव के कारण गांव के मंदिर में प्रवेश से रोक दिया गया था.
इसके जवाब में उन्होंने अपने पूरे शरीर पर ‘राम’ नाम गुदवा लिया. धीरे-धीरे समुदाय के अन्य लोगों ने भी इस परंपरा को अपनाया. यह उनके लिए इस संकल्प का प्रतीक बना कि कोई भी सामाजिक व्यवस्था उन्हें भगवान से दूर नहीं कर सकती.
रामनामी समुदाय के लिए शरीर ही मंदिर का स्वरूप ले लेता है. शरीर पर अंकित राम नाम उनके विश्वास के साथ-साथ उस सामाजिक संघर्ष की भी याद दिलाता है, जिसने इस परंपरा को जन्म दिया. यही विशिष्टता इस समुदाय की कहानी को दृश्यात्मक और सांस्कृतिक रूप से बेहद प्रभावशाली बनाती है.
छत्तीसगढ़ से जुड़ी कई फ़िल्मों का निर्माण
छत्तीसगढ़ भरतबाला के रचनात्मक काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. उन्होंने राज्य की विविध सांस्कृतिक विरासत को कैमरे के माध्यम से दर्ज किया है. उनके प्रोजेक्ट्स में बैगा जनजाति, ढोकरा कला, दंडामी माड़िया, गोटुल परंपरा और सिरपुर की ऐतिहासिक विरासत शामिल हैं.
छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग के सहयोग से तैयार ये वृत्तचित्र जल्दी ही रिलीज किए जाएंगे.
भरतबाला ने कहा कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत विशाल, प्राचीन और आज भी बेहद जीवंत है. यहां की कला, परंपराएं, अनुष्ठान, संगीत और सामुदायिक स्मृतियां इस क्षेत्र की सभ्यता को एक विशिष्ट पहचान देती हैं.
कौन हैं भरतबाला
भरतबाला गणपति फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और निर्माता हैं. उन्होंने सिनेमा, टेलीविजन विज्ञापनों और वृत्तचित्रों के क्षेत्र में काम किया है. राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें ‘वंदे मातरम्’ (1997) और ‘जन गण मन’ (2000) जैसी देशभक्ति परियोजनाओं से पहचान मिली. इनका निर्माण उन्होंने अपने लंबे समय के सहयोगी ए.आर. रहमान के साथ किया.
उनकी पहली फीचर फिल्म ‘हरि ओम’ का प्रीमियर 2004 में टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ और फिल्म ने आठ ऑडियंस अवॉर्ड हासिल किए थे. इसके बाद 2013 में धनुष और पार्वती अभिनीत ‘मरियान’ आई, जिसे समीक्षकों की सराहना मिली. भरतबाला ने 500 से अधिक विज्ञापन अभियानों का निर्देशन भी किया है, जिनमें ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ और ‘स्कूल चलें हम’ प्रमुख हैं.
भरतबाला ने 15 अगस्त 2019 को ‘वर्चुअल भारत’ नाम की लघु वृत्तचित्र श्रृंखला शुरू की. इस परियोजना का उद्देश्य भारत के अलग-अलग हिस्सों के आम लोगों, परंपराओं, कला और लोककथाओं पर आधारित 1,000 लघु फिल्में बनाना है.
ए.आर. रहमान, गुलजार और श्रेया घोषाल जैसे कलाकारों के सहयोग से यह परियोजना जमीनी स्तर की कहानियों को सिनेमाई माध्यम से सामने लाने का प्रयास करती है. इसका उद्देश्य देश की सांस्कृतिक स्मृतियों को संरक्षित करना और उन समुदायों की आवाज को मंच देना है, जो अक्सर मुख्यधारा की नजरों से दूर रह जाते हैं.