बस्तर का प्रसिद्ध गोंचा पर्व चंदन जात्रा रस्म के साथ शुरू
बस्तर की प्रसिद्ध गोंचा पर्व चंदन जात्रा रस्म के साथ शुरू
जगदलपुर | संवाददाताः बस्तर के गोंचा पर्व की पहली रस्म बुधवार को संपन्न हुई. छत्तीसगढ़ के बस्तर में विश्व प्रसिद्ध दशहरा पर्व के बाद दूसरा सबसे बड़ा पर्व गोंचा पर्व मनाया जाता है. 27 दिनों तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत बुधवार को पहली रस्म चंदन जात्रा पूजा विधान के साथ हुई.
इस पर्व को देखने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक बस्तर पहुंचते हैं. 11 जून से शुरू हुआ यह गोंचा पर्व 5 जुलाई तक चलेगा.
इस दौरान 15 से अधिक रस्म निभाई जाएगी. बस्तर में करीब 615 सालों से गोंचा पर्व में निभाई जाने वाली परंपरा को आज भी बस्तरवासी बड़े उत्साह से निभाते आ रहे हैं.
जानकारी के मुताबिक रियासत काल में ओड़िशा राज्य के जगन्नाथ पूरी के महाराजा ने बस्तर के राजा को रथपति की उपाधि दी थी.तब से ओड़िशा के जगन्नाथपुरी के बाद बस्तर में गोंचा पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है.
27 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में गोंचा के दिन बस्तर में तीन विशालकाय रथों पर सवार भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और बलभद्र की रथयात्रा निकाली जाती है.
इस दौरान भगवान जगन्नाथ को बस्तर की पारंपरिक तुपकी (बांस की नली) से सलामी दी जाती है. इस बार भी चंदनयात्रा के साथ महापर्व की शुरुआत हो चुकी है.
360 आरण्यक ब्राम्हण समाज के पूर्व अध्यक्ष हेमंत कुमार पांडेय ने बताया कि बस्तर गोंचा की शुरुआत बुधवार को देव स्नान पूर्णिमा जिसे चंदन जात्रा भी कहा जाता है से शुरू हो गई है. इस रस्म में पूजा अर्चना के बाद भगवान जगन्नाथ मंदिर से निकलकर अपने अनशन काल में जाएंगे.
उन्होंने बताया कि यह कहा जाता है कि भगवान अपने स्वास्थ्यगत कारणों से बीमार होते हैं. भगवान 15 दिनों तक अपने अनशनकाल में किसी को दर्शन नहीं देंगे. भगवान को काढ़ा पिलाया जाता है. जिसे श्रद्धालु भी प्रसाद के रूप में लेते हैं. 26 जून को नेत्र उत्सव का कार्यक्रम होगा, जिसके बाद 27 जून को श्री गोंचा और 5 जुलाई को बाहुड़ा गोंचा पर्व मनाया जाएगा.
तुपकी से रथ को सलामी
बस्तर का गोंचा विश्व प्रसिद्ध है. यहां भगवान को सलामी देने के तौर पर तुपकी चलाई जाती है. तुपकी बांस की बनी एक नली होती है. जिसमें मलकांगिनी के बीज को डालकर फोड़ा जाता है.
उन्होंने बताया कि मान्यता यह है कि मलकांगिनी के फल से चर्म रोग से जुड़ी समस्या का समाधान होता है. पहले के जमाने में इसका भरपूर इस्तेमाल आदिवासी करते आए हैं. इस फल के नाम पर छत्तीसगढ़ से लगे पड़ोसी राज्य ओडिशा में एक शहर भी है, जिसका नाम मलकानगिरी है.
हर रोज बस्तर गोंचा पर्व के तहत कई तरह के कार्यक्रम और पूजा विधान जगन्नाथ मंदिर में आयोजित किए जाएंगे.