नेपाल में गिद्धों के संरक्षण के लिए तीन दर्द निवारक दवाओं पर प्रतिबंध
काठमांडू । डेस्क: नेपाल के औषधि प्रशासन विभाग ने पशु उपचार में इस्तेमाल होने वाली तीन प्रमुख गैर-स्टेरॉयड एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाओं (NSAIDs) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है. विभाग ने सार्वजनिक स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संतुलन पर पड़ने वाले गंभीर नकारात्मक प्रभावों का हवाला देते हुए निमेसुलाइड (Nimesulide), एसेक्लोफेनाक (Aceclofenac) और कीटोप्रोफेन (Ketoprofen) के उपयोग को तत्काल प्रभाव से वर्जित कर दिया है.
ये दवाएं आमतौर पर कुत्तों, घोड़ों और मवेशियों में पुराने ऑस्टियोआर्थराइटिस, मस्कुलोस्केलेटल विकारों और ऑपरेशन के बाद होने वाले दर्द, बुखार और सूजन को कम करने के लिए उपयोग की जाती थीं.
औषधि सलाहकार समिति की 58वीं बैठक की सिफारिशों के आधार पर लिए गए इस फैसले के तहत अब इन दवाओं के उत्पादन, आयात और लाइसेंस नवीनीकरण पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है.
विभाग के सूचना अधिकारी किरण सुंदर बज्राचार्य के अनुसार, पशु चिकित्सकों को मौजूदा स्टॉक बेचने के लिए छह महीने का समय दिया गया है, जिसके बाद शेष स्टॉक निर्माताओं को वापस करना होगा.
यह कदम विशेष रूप से गिद्धों की घटती आबादी को बचाने के लिए उठाया गया है, क्योंकि ये दवाएं 'डाइक्लोफेनाक' की तरह ही घातक पाई गई हैं. जब गिद्ध इन दवाओं से उपचारित पशुओं के शवों को खाते हैं, तो उनके गुर्दे (किडनी) फेल हो जाते हैं, जिससे उनकी मृत्यु हो जाती है.
राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव संरक्षण विभाग के वरिष्ठ पारिस्थितिकी विज्ञानी हरि भद्र आचार्य ने स्पष्ट किया कि गिद्ध संरक्षण के प्रयासों को सफल बनाने के लिए इन दवाओं पर प्रतिबंध अनिवार्य था.
उल्लेखनीय है कि नेपाल सरकार ने 2006 में ही डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके बाद गिद्धों की मृत्यु दर में कुछ कमी आई थी.
हालांकि, हालिया अध्ययनों ने साबित किया है कि निमेसुलाइड और एसेक्लोफेनाक भी समान रूप से जहरीले हैं.
प्रकृति के सफाईकर्मी माने जाने वाले गिद्ध पर्यावरण से हानिकारक रोगजनकों को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. 1980 के दशक में नेपाल ने डाइक्लोफेनाक के अंधाधुंध उपयोग के कारण डंगर, काले और मिस्र के गिद्धों जैसे प्रजातियों को लगभग खो दिया था.
वर्तमान में नेपाल में विभिन्न प्रजातियों के लगभग 20,000 गिद्ध शेष हैं. आईयूसीएन (IUCN) के विशेषज्ञों ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि केवल प्रतिबंध ही काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए बाजार में प्रभावी नियमन और जागरूकता अभियान चलाना भी आवश्यक है ताकि लुप्तप्राय पक्षियों को विलुप्त होने से बचाया जा सके.