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दिल्ली में कृत्रिम वर्षा से प्रदूषण पर लगेगी लगाम

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24 अक्टू. 2025, 02:07 PM 7 मिनट में पढ़ें 1

कृत्रिम वर्षा
कृत्रिम वर्षा

दिल्ली । डेस्क: दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने शुक्रवार को राष्ट्रीय राजधानी में बढ़ते प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित करने के लिए क्लाउड सीडिंग की तकनीक को अनिवार्य बताया है. उनका मानना है कि कृत्रिम वर्षा कराने की यह तकनीक सर्दियों के महीनों में छाए धुंध (स्मॉग) से निपटने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है.


गुरुवार 23 अक्टूबर 2025 को उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र में इस परियोजना का एक सफल परीक्षण किया गया. मुख्यमंत्री गुप्ता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट कर इसकी जानकारी दी और इसे राजधानी की प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण तकनीकी मील का पत्थर बताया.

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आईआईटी-कानपुर और दिल्ली सरकार के संयुक्त तत्वावधान में चलाए जा रहे इस महत्वाकांक्षी क्लाउड सीडिंग प्रोजेक्ट का उद्देश्य दीपावली के बाद प्रदूषण के चरम पर पहुंचने के दौरान शहर में पर्टिकुलेट मैटर (PM) के स्तर को कम करने के लिए कृत्रिम वर्षा के विकल्प की तलाश करना है. पिछले महीने, दिल्ली सरकार ने पाँच क्लाउड सीडिंग ट्रायल के लिए आईआईटी-कानपुर के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे.


परीक्षण में क्या हुआ?

अधिकारियों ने बताया कि परीक्षण के दौरान, कृत्रिम वर्षा को प्रेरित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले यौगिकों - सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड - की थोड़ी मात्रा एक विशेष विमान से छोड़ी गई. इस कार्य के लिए डीजीसीए से अनुमति प्राप्त, आईआईटी-कानपुर के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के सेस्ना 206-एच विमान (VT-IIT) का उपयोग किया गया.


हालांकि, आईआईटी-कानपुर की रिपोर्ट के अनुसार, परीक्षण के समय हवा में नमी का स्तर 15% से भी कम था, जबकि कृत्रिम वर्षा के लिए यह स्तर लगभग 50% होना आवश्यक है. इसी कारण, बुराड़ी क्षेत्र में वर्षा नहीं हुई. संस्थान ने स्पष्ट किया कि यह उड़ान क्लाउड सीडिंग प्रणाली की क्षमता, उपकरण और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय का आकलन करने के लिए एक प्रमाणन मिशन के रूप में कार्य करती थी.


दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मंजीत सिंह सिरसा ने भी पुष्टि की कि इस उड़ान का प्राथमिक लक्ष्य प्रणाली की क्षमताओं और समन्वय का मूल्यांकन करना था.


मुख्यमंत्री गुप्ता ने ₹3.21 करोड़ की लागत वाले इस प्रोजेक्ट पर विश्वास जताते हुए कहा कि यह तकनीक भविष्य की पर्यावरण चुनौतियों से निपटने में सफल साबित हो सकती है. यह परियोजना मई में शुरू होनी थी, लेकिन मानसून की शुरुआत और मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इसमें कई बार देरी हुई. 


अब सरकार इसे सर्दियों के प्रदूषण संकट के स्थायी समाधान के रूप में देख रही है.


क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding) 

एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य बादलों को इस तरह से प्रेरित करना है कि वे वर्षा या हिमपात करें. इसे अक्सर "कृत्रिम वर्षा" (Artificial Rain) के नाम से भी जाना जाता है.यह प्रक्रिया प्राकृतिक वर्षा के तरीके पर आधारित है, लेकिन इसमें बादलों के अंदर कुछ विशेष रासायनिक पदार्थों को मिलाया जाता है ताकि वर्षा की प्रक्रिया को तेज किया जा सके या शुरू किया जा सके.


यहाँ क्लाउड सीडिंग के वैज्ञानिक पहलू और यह कैसे काम करता है, इसकी विस्तृत जानकारी दी गई है:


1. सिद्धांत (The Principle) क्लाउड सीडिंग का सिद्धांत कोल्ड क्लाउड (Cold Cloud, जिसमें तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे होता है) में आइस न्यूक्लिएशन (Ice Nucleation - बर्फ का बनना) की प्रक्रिया को बढ़ावा देना है. प्राकृतिक रूप से, बादलों के भीतर पानी की बूँदें और बर्फ के क्रिस्टल, हवा में मौजूद धूल या पराग जैसे बहुत छोटे कणों के चारों ओर बनते हैं, जिन्हें संक्षेपण नाभिक (Condensation Nuclei) कहा जाता है. क्लाउड सीडिंग में, हम जानबूझकर कृत्रिम संक्षेपण नाभिकों को बादलों में डालते हैं.


2. कैसे काम करती है प्रक्रिया? क्लाउड सीडिंग की प्रक्रिया में मुख्य रूप से दो प्रकार के रासायनिक पदार्थ उपयोग किए जाते हैं, जिन्हें सीडिंग एजेंट कहते हैं:


A. सिल्वर आयोडाइड ($\text{AgI}$) - कोल्ड क्लाउड के लिए कार्य: 


सिल्वर आयोडाइड की क्रिस्टल संरचना प्राकृतिक बर्फ के क्रिस्टल से बहुत मिलती-जुलती है.


प्रक्रिया: जब सिल्वर आयोडाइड के कणों को उन बादलों में छोड़ा जाता है जहाँ तापमान हिमांक से नीचे होता है (कोल्ड क्लाउड), तो ये कण बर्फ नाभिक (Ice Nuclei) का काम करते हैं. ये सुपरकूल्ड पानी की बूँदों (Supercooled Water Droplets - जो 0°C से नीचे होने पर भी तरल रहती हैं) को तुरंत जमने और बर्फ के क्रिस्टल बनाने के लिए एक सतह प्रदान करते हैं.


परिणाम: एक बार जब बर्फ के क्रिस्टल बन जाते हैं, तो वे बादलों में मौजूद अन्य बूँदों से नमी खींचकर तेजी से बड़े हो जाते हैं. जब ये क्रिस्टल इतने भारी हो जाते हैं कि हवा का उठाव उन्हें संभाल नहीं पाता, तो वे पिघलकर बारिश की बूँदें (या सीधे बर्फ के रूप में) नीचे गिर जाते हैं.


B. नमक (जैसे सोडियम क्लोराइड - $\text{NaCl}$) और अन्य पदार्थ - वार्म क्लाउड के लिए कार्य: 


नमक को आमतौर पर वार्म क्लाउड (Warm Cloud, जिनका तापमान हिमांक से ऊपर होता है) में उपयोग किया जाता है.


प्रक्रिया: सोडियम क्लोराइड और कैल्शियम क्लोराइड जैसे हाइग्रोस्कोपिक (Hygroscopic) पदार्थ हवा से नमी को बहुत आसानी से अवशोषित करते हैं.


परिणाम: जब इन्हें वार्म क्लाउड में छोड़ा जाता है, तो ये कण तेजी से पानी को सोखकर बड़े पानी के नाभिक बन जाते हैं. ये बड़े नाभिक आपस में टकराकर और भी बड़ी बूँदें बनाते हैं. जब बूँदें काफी बड़ी हो जाती हैं, तो वे वर्षा के रूप में गिरती हैं. (दिल्ली के मामले में, रिपोर्ट में नमी कम होने के बावजूद दोनों एजेंट्स का जिक्र था, जिसका मतलब है कि वे शायद एक मिश्रित या मूल्यांकन प्रणाली का परीक्षण कर रहे थे.)


3. डिलीवरी के तरीके (Delivery Methods)सीडिंग एजेंटों को बादलों तक पहुँचाने के मुख्य रूप से तीन तरीके हैं:


विमान (Aircraft): जैसा कि दिल्ली के ट्रायल में हुआ, विमानों को बादलों के भीतर या नीचे उड़ाया जाता है. ये विमान विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए ज्वलनशील फ्लेयर्स या डिस्पेंसर का उपयोग करके सीधे लक्षित बादल में सिल्वर आयोडाइड के कणों को छोड़ते हैं.


ग्राउंड जनरेटर (Ground Generators): पहाड़ी क्षेत्रों में, सिल्वर आयोडाइड के घोल को जमीन पर स्थित जनरेटर में जलाया जाता है. धुआँ हवा के ऊपर उठने से बादलों तक पहुँचता है.


रॉकेट या तोप के गोले (Rockets or Cannon Shells): कुछ देशों में सीडिंग एजेंटों को बादलों में सीधे पहुँचाने के लिए विशेष रॉकेट या तोप के गोलों का उपयोग किया जाता है.


4. चुनौतियाँ और सीमाएँ (Challenges and Limitations) क्लाउड सीडिंग कोई जादुई समाधान नहीं है, और इसकी सफलता कुछ सीमाओं पर निर्भर करती है:

पर्याप्त नमी (Sufficient Moisture): सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि बादल में पर्याप्त मात्रा में पानी (नमी) होनी चाहिए. आईआईटी-कानपुर की रिपोर्ट में भी यह स्पष्ट किया गया था कि 50% की आवश्यकता के विपरीत 15% से कम नमी होने के कारण वर्षा नहीं हुई. 


क्लाउड सीडिंग मौजूदा नमी को वर्षा में बदलती है; यह नमी पैदा नहीं करती. 


उपयुक्त तापमान और बादल संरचना (Suitable Temperature and Cloud Structure): बादल का प्रकार, उसका तापमान और ऊँचाई सीडिंग की सफलता को प्रभावित करते हैं.


नैतिक और कानूनी पहलू (Ethical and Legal Aspects): कुछ वैज्ञानिक और कानूनी विशेषज्ञ चिंता व्यक्त करते हैं कि एक क्षेत्र में कृत्रिम वर्षा कराने से हवा से नमी हट सकती है, जिससे पड़ोसी या डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में प्राकृतिक वर्षा कम हो सकती है.


क्लाउड सीडिंग एक महंगा ऑपरेशन है जिसके लिए विशेष विमान, उपकरण और वैज्ञानिक निगरानी की आवश्यकता होती है.क्लाउड सीडिंग का उपयोग न केवल वर्षा कराने के लिए किया जाता है, बल्कि यह ओलावृष्टि (Hail) को नियंत्रित करने और कुछ हद तक कोहरे (Fog) को छाँटने के लिए भी किया जा सकता है. दिल्ली में, इसका मुख्य लक्ष्य प्रदूषण फैलाने वाले महीन कणों को पानी से धोकर जमीन पर लाना है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP