हसदेव अरण्य में एक और कोयला खदान को मंजूरी
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के जैव विविधता से समृद्ध हसदेव अरण्य जंगलों में व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर एक बार फिर बड़ी हलचल शुरू हो गई है. केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने सरगुजा जिले में स्थित केंटे एक्सटेंशन इंटीग्रेटेड कोल ब्लॉक को अंतिम पर्यावरण मंजूरी (ईसी) दे दी है. इस परियोजना के तहत सालाना 90 लाख टन (9 मिलियन टन) कोयला उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है.
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों द्वारा इस क्षेत्र में खनन का लगातार विरोध किया जा रहा है. 1,760 हेक्टेयर में फैले इस कोयला ब्लॉक को साल 2015 में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरवीयूएनएल) को आवंटित किया गया था, जबकि अडानी समूह इस परियोजना में माइन डेवलपर और ऑपरेटर (एमडीओ) के रूप में काम कर रहा है. यहां से निकलने वाले कोयले को राजस्थान के छाबड़ा और सूरतगढ़ ताप विद्युत संयंत्रों में भेजा जाएगा.
यह मंजूरी बीते 9 जून को मिली सैद्धांतिक वन मंजूरी (फॉरेस्ट क्लीयरेंस) के ठीक बाद 24 जून को जारी की गई. मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने इस साल जनवरी में ही इसकी सिफारिश कर दी थी, लेकिन इसे अंतिम वन मंजूरी मिलने तक रोक कर रखा गया था.
हसदेव अरण्य क्षेत्र में यह तीसरी बड़ी कोयला खदान है जिसे हरी झंडी मिली है. इससे पहले परसा और परसा ईस्ट केंटे बासन (पीईकेबी) खदानें यहां पहले से ही संचालित की जा रही हैं. गौरतलब है कि हसदेव अरण्य को कभी वन्यजीवों और पर्यावरण के संरक्षण के लिए खनन मुक्त यानी 'नो-गो ज़ोन' घोषित किया गया था.
इस मंजूरी पर इसलिए भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) ने साल 2021 में किए गए अपने जैव विविधता मूल्यांकन में स्पष्ट रूप से कहा था कि पहले से चल रही पीईकेबी खदान को छोड़कर पूरे हसदेव अरण्य क्षेत्र में किसी भी तरह के नए खनन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.
डब्ल्यूआईआई और भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफरे) की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि खनन गतिविधियों से जंगल के घनत्व और वन्यजीवों के गलियारे (कॉरिडोर) पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. लगभग 1,502 वर्ग किलोमीटर में फैला हसदेव अरण्य मध्य भारत के सबसे बड़े अखंडित जंगलों में से एक है, जो प्राचीन साल और सागौन के वृक्षों, हाथियों, तेंदुओं और बाघों के आवागमन के लिए जाना जाता है.
इस परियोजना के कारण बड़े पैमाने पर होने वाले वनों के विनाश को लेकर स्थानीय आदिवासी समुदायों और विपक्षी दल कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार और केंद्र के इस कदम का कड़ा विरोध किया है. आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, खनन के लिए कुल 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन किया जाएगा, जिसके तहत करीब 4.48 लाख पेड़ों को काटा जाना प्रस्तावित है.
हालांकि, यह कटाई कोयले की आवश्यकता के आधार पर चरणों में की जाएगी. पहले पांच वर्षों में लगभग 98,000 पेड़ और छठे से दसवें वर्ष के बीच 60,000 पेड़ काटे जाएंगे. इसके साथ ही प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि वे 60 सेंटीमीटर से कम गोलाई वाले 67,414 पेड़ों को सुरक्षित रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित (ट्रांसलोकेट) करें.
पर्यावरण के साथ-साथ इसका सामाजिक असर भी देखने को मिलेगा, क्योंकि सरगुजा के उदयपुर तहसील के अंतर्गत आने वाले केंटे, बासन, चकेरी और परोगिया गांवों के 56 परिवार इस परियोजना से सीधे प्रभावित होंगे, जिनके पुनर्वास के लिए राज्य सरकार की नीति के तहत योजना बनाई गई है.