पश्चिम बंगाल के सभी 41 मंत्री हिन्दू, कोई मुस्लिम नहीं
कोलकाता । डेस्क: पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार को एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिला. राज्य के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के मंत्रिमंडल का विस्तार करते हुए 35 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई गई, जिसके बाद अब कुल मंत्रियों की संख्या 41 हो गई है. इस विस्तार की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली बात यह है कि आधी सदी से भी अधिक समय में पहली बार बंगाल की सरकार में एक भी मुस्लिम चेहरा शामिल नहीं है.
सत्तारूढ़ भाजपा ने विधानसभा चुनाव में किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया था, और अब सभी 41 मंत्रियों के हिंदू होने के कारण अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की कमान भी एक गैर-अल्पसंख्यक नेता के हाथों में जाएगी.
हालांकि, संवैधानिक नियमों के अनुसार अगले छह महीनों के भीतर किसी भी गैर-विधायक को चुनकर सरकार में शामिल किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल मौजूदा स्थिति ने राज्य की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है.
सोमवार को हुए इस राजभवन के भव्य समारोह में 13 कैबिनेट मंत्रियों और 22 राज्य मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली. इस नए मंत्रिमंडल के गठन में भाजपा ने कोलकाता के वर्चस्व को तोड़ते हुए ग्रामीण इलाकों और उत्तर बंगाल को बड़ी हिस्सेदारी दी है. लंबे समय से उपेक्षा का शिकार रहे उत्तर बंगाल को इस बार 10 मंत्री पद मिले हैं.
सिलीगुड़ी के विधायक शंकर घोष, फालाकाटा के दीपक बर्मन और कुमारग्राम के मनोज उरांव को कैबिनेट में जगह दी गई है. हालांकि, इस भारी प्रतिनिधित्व के बीच पहाड़ों (हिल्स) को एक बार फिर मायूसी हाथ लगी है और वहां से कोई भी चेहरा कैबिनेट में शामिल नहीं हो सका है.
कोलकाता शहर से केवल तपेन रॉय, स्वप्न दासगुप्ता और इंद्रनील खान जैसे चुनिंदा नाम ही कैबिनेट रैंक तक पहुंच पाए हैं, जो यह साफ दिखाता है कि इस सरकार का झुकाव जिला स्तर के नेताओं की तरफ अधिक है.
इस कैबिनेट विस्तार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की मजबूत छाप साफ दिखाई दे रही है. मयूरेश्वर के दूध कुमार मंडल और सूरी के जगन्नाथ चट्टोपाध्याय जैसे वैचारिक रूप से मजबूत नेताओं को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है.
इसके अलावा, भाजपा ने जमीनी स्तर पर सोशल इंजीनियरिंग की भी एक अनूठी मिसाल पेश की है. घरेलू सहायिका के रूप में काम कर चुकीं औसग्राम की विधायक कलिता माझी को राज्य मंत्री बनाया गया है, तो वहीं कुड़मी समाज के बड़े नेता राजेश महतो को भी सरकार में शामिल कर एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की गई है.
महिला प्रतिनिधित्व की बात करें तो 41 सदस्यीय मंत्रिमंडल में केवल 7 महिलाओं को जगह मिली है, जिसमें अग्निमित्रा पॉल एकमात्र कैबिनेट मंत्री हैं.
इस बड़े फेरबदल में कई बड़े और चर्चित नामों का पत्ता कट गया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में सबको हैरान कर दिया है. मशहूर अभिनेत्री और राजनेता रूपा गांगुली और रुद्रनील घोष को इस बार मंत्री बनने का मौका नहीं मिला.
सबसे ज्यादा चौंकाने वाला फैसला पानीहाटी की उस विधायक को दूर रखना रहा, जो आरजी कर अस्पताल की पीड़िता की मां हैं. माना जा रहा था कि उनकी जीत ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से का प्रतीक थी, लेकिन दिल्ली के शीर्ष नेतृत्व ने भावनात्मक चेहरों के बजाय अनुभवी और पुराने संगठनकर्ताओं पर भरोसा जताना बेहतर समझा.
जानकारों का मानना है कि यह मंत्रिमंडल पूरी तरह से भाजपा के चुनावी एजेंडे और उसकी नई रणनीति को दर्शाता है, जिसने बंगाल की पारंपरिक तुष्टीकरण और क्षेत्रीय राजनीति की दिशा को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है.