विलुप्त होती जा रही होली की प्राचीन विरासत
छत्तीसगढ़ विलुप्त होती जा रही होली की प्राचीन विरासत
रायपुर | संवाददाताः रंगों का त्यौहार होली आने में सिर्फ तीन दिन बाकी रह गया है. लेकिन नगाड़ों की थाप कहीं भी सुनाई नहीं दे रही है और न ही फाग गीतों की गूंज सुनाई दे रही है.
वर्तमान दौर में होली का त्यौहार भी नए रंग में रंगता जा रहा है. जिसके चलते नगाड़ों की धुन और फाग की प्राचीन परंपराएं विलुप्त होती जा रही हैं.
सांस्कृतिक परंपराओं को जीने वाले बुजुर्गों के कान अब फाग गीत सुनने के लिए तरस रहे हैं.
समय के साथ होली का स्वरूप बदल रहा है. पहले पखवाड़े भर गांव, शहर की गलियों, चौक-चौराहों पर नगाड़ों की धुन के साथ फाग गीत सुनाई देता था.
लेकिन अब इसकी जगह कान फोडू डीजे और लाउडस्पीकर ने ले ली है.
जबकि पारंपरिक बाजे नगाड़े के बिना होली का पर्व अधूरा सा लगता है.
हिन्दू पंचांग के मुताबिक इस वर्ष होलिका दहन 13 मार्च को किया जाएगा और धुड़ेहरी 14 मार्च को मनाई जाएगी.
नहीं सुनाई दे रही नगाड़ों की थाप
गांव व शहरों में पहले होलिका दहन की तैयारी पखवाड़े भर पहले शुरू हो जाती थी.
बच्चे लकड़ियां इकट्ठा करने में लग जाते थे. आस-पास के मोहल्लों के बच्चों में होली रचने की होड़ लगती थी.
अब ये सब बीते दिनों की बात हो गई है.
बसंत पंचमी से ही नगाड़ों की थाप की आवाज सुनाई देती थी. लेकिन इस साल स्थिति काफी अलग देखने को मिल रही है.
अभी तक कहीं भी न नगाड़े की थाप सुनाई दे रही है और न कहीं फाग गीतों की गूंज सुनाई दे रही है.
पहले फाग का दौर ग्रामीण क्षेत्रों में 15 दिन और शहरी क्षेत्रों में सप्ताह भर चलता था.
सालों से चली आ रही परंपरा को अब आगे बढ़ाने वाले भी दिखाई नहीं दे रहे हैं.
गिने चुने लोग ही बचे हैं जो इस परंपरा को आगे भी कायम रखना चाहते हैं.
नहीं हो रही नगाड़ों की बिक्री
होली का त्यौहार करीब आने के बाद भी गांव से लेकर शहरों तक फागुन का रंग नजर नहीं आ रहा है.
बाजारों में भी रौनक गायब दिखाई दे रही है. जिसके चलते उमंग का यह त्यौहार इस बार फीका नजर आ रहा है.
नगाड़ा बेचने गांवों से शहर पहुंचे कारीगरों का कहना है कि हर साल की तरह इस साल भी काफी मात्रा में नगाड़ा बना चुके हैं.
लेकिन ग्राहक नहीं आ रहे हैं. सुबह से देर शाम तक खाली बैठे रहकर ग्राहकों का इंतजार कर रहे हैं.
होलिका दहन से होगी शुरुआत
अब होलिका दहन के दिन से माहौल बनना शुरू होता है.
युवाओं की टोली होलिका दहन और फगुआ के दिन ही फाग के रंग में रंगे हुए नजर आते हैं.
रंग गुलाल खेलने के दिन ही होलियारों की टोलियां निकलती हैं. ये टोलियां भी अपने दोस्तों और चौक-चौराहों तक ही सीमित रहती हैं.
जबकि पहले होलियारों की टोलियां घर-घर जाकर रंग खेलती थी. ये परंपरा भी विलुप्त होती जा रही है.
नेशेड़ियों ने बिगाड़ा माहौल
समय के साथ गांवों में भी होली का त्यौहार फीका पड़ता जा रहा है.
गांवों में भी न तो फाग गाने वाले मिल रहे हैं, ना नगाड़ा बजाने वाले सामने आ रहे हैं.
जिसके चलते गांवों में भी यह परंपरा विलुप्त होते जा रही है.
फाग गाने वाले कुछ बुजुर्गों का कहना है कि युवा पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है.
युवा हमारी संगत ही नहीं करते. जिस वजह से विगत कुछ सालों से गाना-बजाना बंद ही हो गया है.
होलिका दहन और रंग गुलाल खेलने के दिन जरूर लोगों को फाग गीत और नगाड़े की याद आती है.
लोग इकट्ठा भी हो जाते हैं. इनमें से अधिकांश लोग नशा किए होते हैं. जिससे माहौल खराब हो जाता है.
विवाद की स्थिति को देखकर कई लोग चाहकर भी सामने नहीं आते.
परीक्षा की तैयारी में बच्चे व्यस्त
अभी कक्षा दसवीं व बारहवीं की बोर्ड परीक्षा चल रही है.
इस कारण बच्चे होली की तैयारियों से दूर परीक्षा की तैयारियों में जुटे हुए हैं.
परीक्षाओं के कारण होलिका दहन के साथ ही रंग गुलाल से दूरी बनाए हुए हैं.
इसलिए भी होली का माहौल नजर नहीं आ रहा है.
अभिभावक भी अपने बच्चों का ध्यान होली के बजाय परीक्षा पर केन्द्रीत कर रहे हैं.