समाजिक बहिष्कार की आग ने बेटे से मां का अंतिम हक भी छीना
छत्तीसगढ़ समाजिक बहिष्कार की आग ने बेटे से मां का अंतिम हक भी छीना
भिलाई | संवाददाताः छत्तीसगढ़ में समाजिक बहिष्कार का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है. विभिन्न समाजों द्वारा मामूली गलती के चलते परिवार और समाज से अलग रहने का फरमान जारी कर दिया जाता है. जिसके चलते पीड़ित परिवार शादी-ब्याह, मृत्यु के साथ ही गांव व समाज के किसी भी आयोजन में शामिल नहीं हो सकता. यहां तक गांव में किसी के घर या खेत में मजदूरी तक नहीं कर सकते.
ऐसा ही एक मामला दुर्ग जिले के उतई से लगे गांव में सामने आया है. यहां साहू समाज ने एक बेटे को अपनी मां की अर्थी को कंधे तक नहीं देने दिया.
उसे अपनी मां के अंतिम संस्कार में अन्य लोगों की तरह सिर्फ शामिल होने की अनुमति मिली थी. बेटे के रूप में अंतिम संस्कार का कोई भी दायित्व उन्हें नहीं निभाने दिया गया.
युवक का अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होंने एक युवती से प्रेम विवाह कर लिया था. जबकि उसने अंतरजातीय नहीं बल्कि स्वजातीय युवती से विवाह किया है.
इसके बाद समाज ने एक और कारनामा करते हुए पीड़ित युवक को 35 हजार रुपए अर्थदंड लेकर समाज में शामिल कर लिया.
आर्थिक दंड के साथ भोजन कराने का फरमान
यह जिले का पहला मामला नहीं है, कुछ दिन पहले ही दुर्ग से लगे एक गांव में अंतरजातीय विवाह करने पर एक परिवार को समाज से अलग कर दिया गया. यह मामला कुर्मी समाज का है.
गांव के एक युवक ने दूसरे समाज की युवती से शादी कर उसे घर ले आया था. इसके विरोध में गांव में पंचायत जुटी और पीड़ित परिवार को समाज के सामने खड़ा कर दंडित किया गया.
समाज ने गरीब परिवार के सामने ऐसी शर्त रखी जिसे पूरा करना उसके लिए आसान नहीं था.
समाज का फरमान था कि 20 हजार रुपए अर्थदंड के अलावा समाज के परिवारों के साथ ही गांव के प्रत्येक घर से एक-एक व्यक्ति को भोजन कराने की सजा सुनाई गई.
इस सजा को सुनकर गरीब परिवार समाज के सामने गिड़गिड़ाता रहा मगर कोई सुनवाई नहीं हुई.
अंतरजातीय विवाह करने पर 1 लाख अर्थदंड
इसी प्रकार धमधा ब्लॉक में अंतरजातीय विवाह करने पर एक परिवार को 1 लाख रुपए अर्थदंड से दंडित किया गया है. साहू समाज के युवक ने नाई समाज की युवती से शादी की थी.
अर्थदंड के अलावा समाज ने यह भी शर्त रखी थी कि युवती के परिवार से किसी भी प्रकार को कोई संबंध आगे नहीं रखना है. ना ही युवती अपने मां-बाप से कभी मिलने जाएगी.
इतना ही नहीं युवती घर-परिवार में होने वाले किसी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकेगी.
दुर्ग जिले के एक और मामले में गांव में चंदा नहीं देना एक परिवार को भारी पड़ गया. समाज द्वारा उसे गांव में किसी के घर आने-जाने और मेल मुलाकात पर ही पाबंदी लगा दी गई है.
कुर्मी समाज का फरमान है अगर किसी ने इस परिवार को बुलाया या उनके यहां गया तो उसे भी बेदखल कर दिया जाएगा.
इसी प्रकार से प्रदेश में करीब 18 हजार से अधिक समाजिक बहिष्कार के मामले दर्ज हैं. सामाजिक बहिष्कार जैसी कुरीति को रोकने के लिए अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. दिनेश मिश्र लगातार प्रयास कर रहे हैं.
उन्होंने इसे रोकने के लिए शासन-प्रशासन से लेकर केंद्र सरकार तक गुहार लगाई है.
दंड के रूप में अनोखी मांग
छत्तीसगढ़ में सामाजिक बहिष्कार एक गंभीर समस्या है. खासकर ग्रामीण इलाकों में इसके मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं.
खासकर अंतरजातीय विवाह, प्रेम विवाह, धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत झगड़ों के कारण लोगों को सामाजिक बहिष्कार किया जाता रहा है.
समाज द्वारा बहिष्कार के बाद उसे समाज में शामिल करने के लिए दंड का प्रावधान तय कर रखा है. सामाजिक बैठक आहूत कर दंड तय किया जाता है.
दंड के रूप में कई बार अनोखी मांग की जाती है. अधिकतर मामलों में राशि ही मुख्य दंड है. लेकिन कुछ मामलों में राशि के साथ समाज को बकरा भात खिलाने का दंड दिया जाता है.