कर्नाटक की मसौदा मतदाता सूची से 1.08 करोड़ नाम गायब
बेंगलुरु । डेस्क: कर्नाटक में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के प्रगणन चरण के बाद जारी मसौदा मतदाता सूची ने राज्य में बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने का एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया है, जिसने सभी को चौंका दिया है. राज्य के कुल 224 विधानसभा क्षेत्रों में से करीब 1.08 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि पुनरीक्षण से पहले मौजूद कुल 5.54 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 19.5 प्रतिशत यानी हर पांच में से एक मतदाता का नाम सूची से गायब हो चुका है. तेलंगाना के बाद, जहां 21.7 प्रतिशत नाम हटाए गए थे, कर्नाटक में नाम कटने की यह दर देश के बड़े राज्यों में सबसे चिंताजनक पैटर्न पेश करती है.
योग्य आबादी से 67 लाख पीछे छूटा आंकड़ा
भारत निर्वाचन आयोग ने इस पुनरीक्षण के दौरान राज्यों का 18 वर्ष से अधिक आयु वर्ग की जनसंख्या के अनुपात में मतदाताओं का आंकड़ा (EP रेशियो) जारी नहीं किया है. आयोग का कहना है कि नए जनगणना आंकड़ों के अभाव में इसे जारी नहीं किया गया, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है कि वास्तव में कितने मतदाता सूची में होने चाहिए थे. सरकारी आंकड़ों के अनुमान के अनुसार, कर्नाटक की नई मसौदा सूची राज्य की मतदान योग्य वास्तविक आबादी से कम से कम 67 लाख कम है. संकट यह भी है कि मौजूदा मसौदा सूची में शामिल 44 लाख अन्य मतदाताओं को भी विसंगतियों के चलते नोटिस दिए जाने की संभावना है.
बेंगलुरु के 5 इलाकों में आधी से ज्यादा मतदाता सूची साफ
हटाए गए नामों का सबसे बड़ा केंद्र राजधानी बेंगलुरु और उसके आसपास के इलाके बने हैं. राज्य के पांच विधानसभा क्षेत्रों-बोम्मनहल्ली (54.8%), दासरहल्ली (52.1%), बी.टी.एम. लेआउट (51.6%), विजयनगर (51.1%) और सी.वी. रामन नगर (51.1%)-में 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं के नाम काट दिए गए हैं. देश के किसी भी बड़े राज्य में ऐसा पहली बार देखा गया है जहां किसी विधानसभा क्षेत्र की आधी से ज्यादा मतदाता सूची एक झटके में हटा दी गई हो. राज्य भर में हुई कुल 1.08 करोड़ कटौतियों में से आधी यानी 50 फीसदी कटौतियां सिर्फ 36 विधानसभा क्षेत्रों से हुई हैं, जिनमें से 28 क्षेत्र अकेले बेंगलुरु के हैं. वहीं बेंगलुरु से बाहर गुलबर्मा दक्षिण में 34 फीसदी मतदाता कम हुए हैं.
'मृतक' कम, 'लापता' और 'स्थान परिवर्तन' के कारण ज्यादा हटे नाम
आंकड़ों का विश्लेषण दर्शाता है कि कर्नाटक में नाम हटाए जाने का कारण तमिलनाडु जैसे पड़ोसी राज्यों से काफी भिन्न है. राज्य में कुल हटाए गए नामों में से केवल 15.2 प्रतिशत को 'मृतक' श्रेणी में रखा गया है, जबकि बड़ा हिस्सा 'अनुपस्थित' या 'स्थान स्थानांतरित' होने के नाम पर हटाया गया है. तमिलनाडु में SIR प्रक्रिया के दौरान हटाए गए 97 लाख नामों में से 27.6 फीसदी मतदाता मृत दर्ज किए गए थे. कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में भी लोगों के 'स्थानांतरित' या 'अनुपस्थित' होने के आधार पर भारी संख्या में नाम काटे गए हैं.
वेबसाइट की खामियों और आंकड़ों की गोपनीयता से बढ़ा संदेह
इस पूरी प्रक्रिया के बीच कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कामकाज और पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहे हैं. अन्य राज्यों की तरह कर्नाटक चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर हटाए गए मतदाताओं की सूची खोजने योग्य (Searchable) प्रारूप में अपलोड नहीं की गई है, बल्कि इसे अलग-अलग गूगल ड्राइव लिंक के माध्यम से अंग्रेजी में साझा किया गया है. पोलिंग बूथों के नए परिसीमन के बाद पुराने बूथ नंबरों का उल्लेख न होने से आम लोगों के लिए अपना नाम ढूंढना बेहद कठिन हो गया है. इसके अलावा, अन्य राज्यों के विपरीत कर्नाटक ने इस बात का लिंग-वार (Gender-wise) डेटा भी सार्वजनिक नहीं किया है कि सूची से बाहर हुए 1.08 करोड़ लोगों में कितनी महिलाएं, पुरुष या ट्रांसजेंडर शामिल हैं.