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ट्रंप ने H-1B वीजा आवेदनों पर 88 लाख रुपये का शुल्क लगाया

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20 सित. 2025, 09:58 AM 4 मिनट में पढ़ें 1

 H-1B वीजा
H-1B वीजा

वॉशिंगटन । डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक महत्वपूर्ण घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत H-1B वीजा के लिए सालाना 1,00,000 डॉलर (लगभग 88 लाख रुपये) का नया शुल्क लगाया जाएगा. यह कदम ट्रंप प्रशासन की आप्रवासन नीति को और सख्त बनाने की दिशा में एक बड़ा प्रयास है, जो अमेरिकी श्रमिकों की रक्षा करने और केवल 'असाधारण प्रतिभाओं' को देश में लाने पर केंद्रित है. 


व्हाइट हाउस के स्टाफ सेक्रेटरी विल शार्फ ने इसे अमेरिकी आव्रजन प्रणाली की 'सबसे अधिक दुरुपयोग होने वाली' व्यवस्था बताया, जो मूल रूप से उन कुशल विदेशी श्रमिकों के लिए है जो अमेरिकियों द्वारा न भरे जाने वाले क्षेत्रों में काम करते हैं.


ट्रंप ने ओवल ऑफिस में कॉमर्स सेक्रेटरी हावर्ड लुटनिक की मौजूदगी में इस घोषणा पर हस्ताक्षर करते हुए कहा, "हमें श्रमिक चाहिए. हमें महान श्रमिक चाहिए. यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसा ही हो." उनका कहना था कि यह शुल्क कंपनियों को मजबूर करेगा कि वे केवल वास्तव में उच्च कुशल लोगों को ही स्पॉन्सर करें, न कि अमेरिकी नौकरियों को छीनने वालों को. लुटनिक ने ऐतिहासिक आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि "हम दुनिया का इकलौता देश थे जो निचले स्तर के लोगों को ला रहे थे. अब हम ऐसा नहीं करेंगे. हम केवल शीर्ष प्रतिभाओं को लेंगे, जो अमेरिकियों के लिए नौकरियां पैदा करेंगी."


इस बदलाव से अमेरिकी ट्रेजरी को सालाना 100 अरब डॉलर से अधिक की आय होगी, जिसका उपयोग कर कटौती और कर्ज चुकाने में किया जाएगा. ट्रंप ने इसे "बहुत सफल" बताया. यह शुल्क न केवल नए आवेदनों पर, बल्कि रिन्यूअल पर भी लागू होगा. 


गौरतलब है कि H-1B वीजा मूल रूप से तीन साल के लिए वैध होता है, जिसे तीन और साल के लिए बढ़ाया जा सकता है. अगर कंपनी ग्रीन कार्ड के लिए स्पॉन्सर करती है, तो इसे और लंबा किया जा सकता है, लेकिन भारतीय पेशेवरों के लिए ग्रीन कार्ड की प्रतीक्षा दशकों लंबी है. अब कंपनियां इस शुल्क को चुकाने का फैसला करेंगी कि कर्मचारी कितना मूल्यवान है.


यह कदम विशेष रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों को प्रभावित करेगा, जो अमेरिकी टेक कंपनियों में H-1B पर सबसे अधिक निर्भर हैं. लुटनिक ने कहा, "अब बड़ी टेक कंपनियां विदेशी श्रमिकों को ट्रेन नहीं करेंगी. वे हमारे विश्वविद्यालयों के हालिया स्नातकों को ट्रेन करेंगी. अमेरिकियों को नौकरियां दें." 


ट्रंप ने जोर देकर कहा कि टेक कंपनियां इससे खुश हैं. "वे इसे पसंद करती हैं. उन्हें इसकी जरूरत है. मुख्य बात यह है कि महान लोग आएंगे."


साथ ही, ट्रंप ने 'गोल्ड कार्ड' नामक एक कार्यकारी आदेश पर भी हस्ताक्षर किए, जो असाधारण क्षमता वाले विदेशियों के लिए नया वीजा पथ खोलेगा. इसके तहत व्यक्ति 1 मिलियन डॉलर (लगभग 84 करोड़ रुपये) या कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप पर 2 मिलियन डॉलर देकर तेजी से वीजा और ग्रीन कार्ड पा सकेंगे. 


ट्रंप ने कहा, "यह सैकड़ों अरब डॉलर लाएगा. हम इससे कर कम करेंगे, कर्ज घटाएंगे. कंपनियां जरूरी विशेषज्ञों को रख सकेंगी."


लुटनिक ने स्पष्ट किया कि यह शुल्क पहले से मौजूद H-1B धारकों के रिन्यूअल, नए आवेदनों या विदेश से आने वालों पर लागू होगा. "कंपनी तय करेगी कि व्यक्ति 1,00,000 डॉलर सालाना के लायक है या नहीं. अन्यथा, वे घर लौटें और अमेरिकी को हायर करें." 


ट्रंप ने टेक सीईओज की चिंताओं को खारिज करते हुए कहा, "सब खुश होंगे. हम उत्पादक लोगों को रखेंगे."


यह नीति ट्रंप के समर्थकों और बड़े दानदाताओं के बीच बहस को समाप्त करती प्रतीत होती है, जो H-1B के दुरुपयोग पर चिंतित थे. 


हालांकि, टेक क्षेत्र में चिंताएं बरकरार हैं, क्योंकि 2025 की पहली छमाही में अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी कंपनियों ने हजारों H-1B वीजा प्राप्त किए थे. विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारतीय आईटी कंपनियों जैसे टीसीएस और इंफोसिस पर भारी पड़ेगा, जहां हजारों कर्मचारी प्रभावित हो सकते हैं.


ट्रंप प्रशासन का दावा है कि यह अमेरिकी श्रमिकों को प्राथमिकता देगा और आव्रजन को 'मूल्यवान' बनाएगा. लेकिन आलोचक इसे कुशल आप्रवासन पर अनावश्यक बाधा बता रहे हैं. फिलहाल, कंपनियां अपने विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में रहने या लौटने की सलाह दे रही हैं. (फोटो- प्रतीकात्मक फोटो)

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP