दक्षिण भारत में ज़्यादा कर्ज लेने वाले, छत्तीसगढ़ सबसे कम में से एक
नई दिल्ली । डेस्क: सांख्यिकी मंत्रालय के अर्ध-वार्षिक जर्नल 'सर्वेक्षण' के नवीनतम अंक में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, दक्षिण भारत के लोग देश के बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक ऋणी हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्र की अधिक समृद्धि को दर्शाता है, जिससे वहाँ के परिवार उच्च ऋण लेने और उसे प्रभावी ढंग से चुकाने में सक्षम हैं.
राष्ट्रीय स्तर पर, 2021 में भारत की लगभग 15 प्रतिशत वयस्क आबादी पर बकाया कर्ज़ था.
दक्षिण भारतीय राज्यों में कर्ज़ का प्रतिशत काफी अधिक है:
आंध्र प्रदेश में दो में से पाँच से अधिक लोग यानी 43.7% ऋणी हैं.
इसके बाद तेलंगाना (37.2%), केरल (29.9%), तमिलनाडु (29.4%), पुडुचेरी (28.3%), और कर्नाटक (23.2%) का स्थान है.
कम ऋणी वाले राज्य
प्रमुख राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, दिल्ली (3.4%) में सबसे कम ऋणग्रस्तता दर्ज की गई, जिसके बाद छत्तीसगढ़ (6.5%) का स्थान रहा.
अन्य कम ऋणी वाले राज्यों में असम (7.1%), गुजरात (7.2%), झारखंड (7.5%), पश्चिम बंगाल (8.5%), और हरियाणा (8.9%) शामिल हैं.
विशेषज्ञों की राय
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के एसोसिएट डायरेक्टर पारस जसराई के अनुसार, दक्षिणी राज्यों के लोगों की प्रति व्यक्ति आय अधिक है, उनके पास अधिक संपत्ति है, और वित्तीय समावेशन भी बेहतर है. उन्होंने कहा कि उनका क्रेडिट-टू-डिपॉजिट अनुपात भी देश के बाकी हिस्सों से अधिक है, जिससे ऋणदाता आश्वस्त होकर ऋण देते हैं.
यह अध्ययन राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के 78वें दौर (2020-21) के बहु-संकेतक सर्वेक्षण (MIS) के डेटा पर आधारित है.
अध्ययन में पाया गया कि ऋणग्रस्तता और घरेलू आर्थिक स्थिति के बीच एक सीधा संबंध है, और ऋणग्रस्तता तथा घरेलू आकार के बीच एक व्युत्क्रम संबंध है.
जाति के अनुसार, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में ऋणग्रस्तता सबसे अधिक (16.6%) और अनुसूचित जनजाति (ST) में सबसे कम (11%) पाई गई.
स्वरोजगार, वेतनभोगी/मजदूरी पर कार्यरत, और अस्थायी दिहाड़ी मजदूरों में ऋणग्रस्तता काफी अधिक थी.
ग्रामीण (15%) और शहरी (14%) आबादी के बीच ऋणग्रस्तता में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया.