डिजिटल युग में बच्चों की बदलती पसंद: क्या मोबाइल के शोर में खो रही है किताबें ?
कोलकाता । डेस्क: वर्तमान समय में बच्चों का बचपन किताबों के पन्नों से ज्यादा स्मार्टफोन की स्क्रीन पर बीत रहा है. एक हालिया विश्लेषण के अनुसार, 8 से 13 वर्ष की आयु के बच्चों में कहानियों की किताबों के प्रति रुचि कम होती जा रही है. अर्णव, मेघा और अंकिता जैसे कुछ बच्चे आज भी उपेन्द्रकिशोर रायचौधुरी, लीला मजूमदार और नारायण गंगोपाध्याय के साहित्य में सुकून ढूँढते हैं, लेकिन शुभ्रजित जैसे बच्चों की संख्या कहीं अधिक है, जो रील देखने और गेम खेलने को प्राथमिकता देते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि पाठ्यक्रम का बोझ और मोबाइल की लत ने बच्चों की एकाग्रता और धैर्य को कम कर दिया है, जिससे वे लंबी कहानियों या उपन्यासों से दूर भाग रहे हैं.
प्रकाशक और शिक्षाविदों का कहना है कि आज के दौर में बच्चों को उनकी आधुनिक सोच और वास्तविकता के करीब ले जाने वाले साहित्य की आवश्यकता है. प्रकाशक सौमेन दासगुप्त के अनुसार, अब रूपकथाओं की मांग कम हो रही है, जबकि विज्ञान कथाओं (साइंस फिक्शन) में बच्चों की रुचि बरकरार है.
वहीं, शुभंकर दे जैसे जानकारों का मानना है कि बांग्ला और क्षेत्रीय भाषाओं की किताबों के प्रस्तुतीकरण और चित्रों में आधुनिक बदलाव की जरूरत है ताकि वे अंग्रेजी किताबों की तरह आकर्षक लगें. सेवानिवृत्त शिक्षिका सुदेष्णा मैत्र के अनुसार, बच्चों को सीधे बड़े उपन्यासों के बजाय रंगीन चित्रों वाली छोटी कहानियों से जोड़ना शुरुआती कदम होना चाहिए.
इस समस्या की जड़ में पारिवारिक संरचना में आए बदलाव को भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है. साहित्यकार महुआ दासगुप्त का कहना है कि संयुक्त परिवारों के टूटने से दादा-दादी या नाना-नानी से कहानियाँ सुनने का चलन खत्म हो गया है, जिसके कारण बच्चे अकेलेपन में मोबाइल को अपना साथी बना रहे हैं.
माता-पिता द्वारा बचपन से ही खाना खिलाने या बहलाने के लिए मोबाइल का सहारा लेना उनकी कल्पनाशीलता को खत्म कर रहा है.
अंततः, शिक्षकों और अभिभावकों का मानना है कि स्कूल की लाइब्रेरी को सक्रिय करके और घर में पढ़ाई का माहौल बनाकर ही बच्चों को फिर से किताबों की जादुई दुनिया में वापस लाया जा सकता है, जो उनके शब्द ज्ञान और नैतिक मूल्यों के विकास के लिए अनिवार्य है.