मृत्युपूर्व बयान में डॉक्टर का मानसिक फिटनेस प्रमाण पत्र जरूरी
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक 30 वर्षीय व्यक्ति को अपनी पत्नी की हत्या के आरोप से बरी कर दिया है. यह फैसला निचली अदालत द्वारा उसे दी गई आजीवन कारावास की सज़ा को पलटते हुए प्रक्रियात्मक चूक के आधार पर लिया गया है.
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने अपने फैसले में पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए मृत्युकालिक कथन (Dying Declaration) में पीड़िता की मानसिक फिटनेस की पुष्टि करने वाला अनिवार्य चिकित्सा प्रमाण पत्र अनुपस्थित था. कोर्ट ने कहा कि ऐसी चूक का लाभ आरोपी को मिलना चाहिए.
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि केवल मृत्युकालिक कथन पर भरोसा करना असुरक्षित है, क्योंकि इसे रिकॉर्ड किए जाने के समय इलाज कर रहे डॉक्टर ने पीड़िता की मानसिक स्थिति को प्रमाणित नहीं किया था.
यह मामला 24 अप्रैल, 2019 को बालोद जिले के बरही गांव का है, जहां पति ने अपनी पत्नी को आग लगाकर मार डाला था. महिला 80 प्रतिशत जल गई थी और 5 मई, 2019 को रायपुर के एक अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई थी. निचली अदालत ने जून 2022 में नायब तहसीलदार द्वारा दर्ज किए गए पीड़िता के मृत्युकालिक कथन के आधार पर मुख्य रूप से आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.
हाई कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को यह निर्देश भी दिया है कि वे सभी प्राधिकरणों और जांच एजेंसियों को कड़े निर्देश जारी करें. ये निर्देश सुनिश्चित करेंगे कि भविष्य में ऐसी प्रक्रियात्मक चूक न हो, जिसके कारण विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्तियाँ (acquittal) हों.
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेटों, चिकित्सा अधिकारियों और जांच अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मृत्युकालिक कथन के साथ पीड़िता की मानसिक फिटनेस का डॉक्टर का प्रमाण पत्र अवश्य हो.