छत्तीसगढ़ HC: पत्नी द्वारा साथ रहने से इंकार और ₹2 करोड़ की मांग मानसिक क्रूरता
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पति के पक्ष में जारी तलाक की डिग्री और 10 लाख रुपये के स्थायी भरण-पोषण (अलमोनी) के आदेश को सही ठहराया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक अलग रहना, बार-बार समझाने के बाद भी पत्नी द्वारा साथ रहने से इनकार करना और अचानक बड़ी रकम की मांग करना पति के प्रति मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है.
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली पत्नी की अपील को खारिज कर दिया. हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों का वैवाहिक संबंध इस मोड़ पर पहुंच चुका है जहां से सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है.
व्यावहारिक रूप से यह शादी पूरी तरह टूट चुकी है और दोनों को इस रिश्ते में बांधे रखना केवल उनकी परेशानियों को बढ़ाना होगा.
मामला वर्ष 2020 में हुई शादी से जुड़ा है, जिसके बाद से ही दोनों के बीच विवाद शुरू हो गए थे. पत्नी फरवरी 2022 से अपने मायके में रह रही थी. पति ने आरोप लगाया था कि काउंसिलिंग और पुलिस मध्यस्थता (वन स्टॉप सखी सेंटर) के प्रयासों के बावजूद पत्नी वापस लौटने को तैयार नहीं हुई, जिससे उसे मानसिक आघात पहुंचा.
दूसरी ओर, पत्नी ने पति पर प्रताड़ना और उसके नाम से फर्जी मैट्रिमोनियल प्रोफाइल बनाने का आरोप लगाया था.
हाईकोर्ट में सुनवाई और मध्यस्थता के दौरान पत्नी ने तलाक की सहमति के बदले 2 करोड़ रुपये की एकमुश्त मांग रखी. अदालत ने माना कि यह अत्यधिक मांग और बिना किसी ठोस वजह के सालों तक अलग रहना यह दर्शाता है कि पत्नी की शादी बचाने में कोई वास्तविक रुचि नहीं थी.
पत्नी की फाइन आर्ट्स में स्नातक की योग्यता, पति के व्यवसाय और सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने 10 लाख रुपये की अलमोनी राशि को उचित पाया. अदालत ने फैमिली कोर्ट के फैसले में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए पति को चार सप्ताह के भीतर यह राशि जमा करने का निर्देश दिया.