बांग्लादेश में युनूस सरकार ने धार्मिक पर्वों की छुट्टियां रद्द की
ढाका । डेस्क: बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार एक नए विवाद के केंद्र में आ गई है. नए शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत के साथ ही शिक्षा विभाग द्वारा जारी छुट्टियों की सूची ने देशभर में तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा कर दी हैं. इस सूची में न तो 21 फरवरी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस को छुट्टी दी गई है और न ही मई दिवस को. इसके अलावा जन्माष्टमी, सरस्वती पूजा सहित कई धार्मिक और सांस्कृतिक पर्वों की छुट्टियां भी इस बार सूची से हटा दी गई हैं.
21 फरवरी बांग्लादेश के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है. यह वही दिन है, जब 1952 में बंगाली भाषा के अधिकार के लिए हुए ऐतिहासिक भाषा आंदोलन में कई छात्रों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी. बाद में संयुक्त राष्ट्र ने इसे अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मान्यता दी. ऐसे में इस दिन को अवकाश सूची से बाहर रखना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहा है. आलोचकों का कहना है कि यह फैसला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व को कमतर आंकने जैसा है.
सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक, इस फैसले को लेकर सरकार पर “भाषा आंदोलन विरोधी” छवि गढ़ने के आरोप लग रहे हैं. कई बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों का कहना है कि भाषा आंदोलन बांग्लादेश की राष्ट्रीय पहचान की बुनियाद है और उससे जुड़े दिन की छुट्टी रद्द करना उस गौरवशाली इतिहास को मिटाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
माध्यमिक और उच्च शिक्षा विभाग द्वारा जारी नई सूची के अनुसार, इस शैक्षणिक वर्ष में कुल 64 दिन की छुट्टियां होंगी, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12 दिन कम हैं. इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि स्कूल निरीक्षण या किसी सरकारी अधिकारी के दौरे के नाम पर अतिरिक्त छुट्टी नहीं दी जाएगी. इतना ही नहीं, अधिकारियों को श्रद्धांजलि देने या औपचारिक कार्यक्रमों के लिए छात्रों को लंबे समय तक खड़ा रखने पर भी रोक लगाई गई है.
जहां सरकार इन फैसलों को शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन और निरंतरता लाने के कदम के रूप में पेश कर रही है, वहीं आलोचकों का मानना है कि छुट्टियों में कटौती का बोझ सीधे छात्रों पर पड़ेगा. पहले जिन दिनों जैसे शब-ए-मेराज, बुद्ध पूर्णिमा, आशुरा, मधु पूर्णिमा और महालया पर अवकाश होता था, अब उन सभी दिनों में नियमित कक्षाएं होंगी. इससे धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के सम्मान को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
गण फोरम के कार्यकारी अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील सुब्रत चौधरी ने इस निर्णय को “तुग़लकी” करार दिया है. उनका कहना है कि युनूस सरकार का काम केवल निष्पक्ष चुनाव कराना है, न कि इतिहास और परंपराओं में बदलाव करना. चौधरी ने आरोप लगाया कि इस फैसले से सरकार ने यह संदेश दिया है कि उसे आम जनता की भावनाओं की कोई परवाह नहीं है.
विवाद यहीं तक सीमित नहीं है. रमजान और ईद-उल-फितर की छुट्टियों में भी कटौती की गई है. रमजान की छुट्टियां अब 8 मार्च से शुरू होंगी, जिस पर कई अभिभावकों और धार्मिक संगठनों ने आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि उपवास के दौरान छात्रों को स्कूल आना शारीरिक और मानसिक रूप से कठिन हो सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय महत्व के दिनों और धार्मिक पर्वों की छुट्टियां रद्द करना एक खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है. इससे न केवल सामाजिक सौहार्द प्रभावित होगा, बल्कि सरकार और जनता के बीच विश्वास की खाई भी गहरी हो सकती है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि बढ़ते विरोध के बीच यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करती है या नहीं.