क्या होर्मुज जलडमरूमध्य बनेगा दूसरा 'स्वेज संकट'?
नई दिल्ली । डेस्क: इतिहास खुद को दोहराता नहीं है, लेकिन वह एक जैसी धुन जरूर सुनाता है. साल 1967 में मिस्र और इजरायल के बीच युद्ध छिड़ने के बाद स्वेज नहर को बंद कर दिया गया था, जिससे 15 जहाज पूरे 8 साल तक वहीं फंसे रह गए और इतिहास में उन्हें 'येलो फ्लीट' के नाम से जाना गया. आज ठीक वैसा ही एक 'ऐतिहासिक विज्ञान फंतासी' जैसा संकट मध्य पूर्व के सबसे महत्वपूर्ण तेल-गैस समुद्री मार्ग, हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडरा रहा है.
अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण लगभग 90 दिनों से बंद इस मार्ग ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की सांसें अटका दी हैं. हालांकि बाजार के जानकारों का मानना है कि यह गतिरोध जल्द ही (जून या जुलाई तक) समाप्त हो जाएगा, लेकिन क्या होगा अगर यह संकट साल 2026 के अंत या 2027 तक खिंच गया?
वार्ता की मेज पर '50-50' की उम्मीद, पर अनिश्चितता बरकरार
इस संकट को सुलझाने के लिए वाशिंगटन और तेहरान के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता से बातचीत चल रही है. संयुक्त अरब अमीरात के एक वरिष्ठ राजनयिक के अनुसार, तत्काल किसी समझौते पर पहुंचने की संभावना अभी '50-50' बनी हुई है. वहीं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी बातचीत में 'मामूली प्रगति' का संकेत दिया है.
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या शुरुआती दौर में होने वाला केवल एक पन्ने का समझौता इस रणनीतिक जलमार्ग को पूरी तरह से सुरक्षित और बहाल कर पाएगा?
UAE की दूरदर्शी तैयारी: दूसरे बाईपास पाइपलाइन की योजना तेज
सुरक्षा और आर्थिक जोखिमों को भांपते हुए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बाईपास करने वाली अपनी दूसरी पाइपलाइन परियोजना पर काम तेज कर दिया है. UAE का लक्ष्य इसे 2027 तक सेवा में लाना है. अबू धाबी का यह कदम दुनिया के लिए एक बड़ा संकेत है कि यह जलमार्ग कई लोगों की उम्मीदों से कहीं अधिक समय तक असुरक्षित और ठप रह सकता है.
यदि संकट लंबा खिंचता है, तो सऊदी अरब और UAE अपनी बाईपास क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं, लेकिन कुवैत, इराक और विशेष रूप से कतर (जो LNG निर्यात के लिए पूरी तरह हॉर्मुज पर निर्भर है) के लिए कोई अन्य आसान रास्ता नहीं है.
आखिर क्यों नहीं झुक रहे ट्रंप और ईरानी नेतृत्व?
आमतौर पर आर्थिक नुकसान देशों को समझौते के लिए मजबूर करते हैं, लेकिन वर्तमान स्थिति में दोनों पक्षों को अभी तक ऐसा कोई असहनीय दर्द नहीं मिला है:
अमेरिका की स्थिति: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह युद्ध अब तक वित्तीय रूप से काफी सस्ता रहा है. अमेरिकी शेयर बाजार (S&P 500) सर्वकालिक उच्च स्तर के करीब है और युद्ध की शुरुआत से इसमें 10% की बढ़त देखी गई है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था 4% से अधिक की अनुमानित विकास दर से दौड़ रही है.
ईरान का रुख: दूसरी तरफ, ईरान बढ़ती बेरोजगारी, खाद्य मुद्रास्फीति और अपनी मुद्रा में भारी गिरावट का सामना कर रहा है. अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी के कारण वह तेल निर्यात नहीं कर पा रहा है और उसे उत्पादन घटाना पड़ा है. इसके बावजूद, ईरानी शासन ने अतीत में भी अस्तित्व के संकट के समय दर्द सहने की अपनी अपार क्षमता का प्रदर्शन किया है.
वैश्विक अर्थव्यवस्था के बफर स्टॉक खाली होने का डर
अब तक दुनिया ने हॉर्मुज से गुजरने वाले लगभग 2 करोड़ बैरल तेल की कमी को संभाल लिया है क्योंकि युद्ध से पहले बाजार में आपूर्ति अधिशेष (Oversupply) थी. सऊदी और UAE ने अपनी मौजूदा बाईपास पाइपलाइनों का उपयोग किया है, और अमीर देशों ने अपने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) को बाजार में उतारा है. चीन ने भी अपनी तेल आयात निर्भरता को चालाकी से कम किया है.
लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि हॉर्मुज 2026 के अंत या 2027 तक बंद रहता है, तो ये सभी बफर स्टॉक समाप्त हो जाएंगे. इसके बाद दुनिया को 'डिमांड डिस्ट्रक्शन' (मांग में भारी कमी) का सामना करना पड़ेगा, जहां आसमान छूती कीमतों के कारण मजबूरन ईंधन का उपयोग बंद करना होगा.
दुनिया के कुल तेल का 10% से 15% हिस्सा हॉर्मुज से आता है. इसके बिना जीने का मतलब होगा 1973 और 1979 जैसे तेल संकटों की पुनरावृत्ति, जो अंततः वैश्विक मंदी का कारण बन सकती है. फिलहाल, दुनिया को एक ऐसे तात्कालिक और व्यावहारिक समझौते की दरकार है जिससे यह तबाही टल सके.