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उच्च आय वर्ग के करीब पहुंचने के बाद भी चीन विकासशील देश ही रहेगा

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14 अक्टू. 2026, 07:18 AM 4 मिनट में पढ़ें 17

ग्लोबल टाइम्स
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बीजिंग । डेस्क: हाल के वर्षों में चीन की तीव्र आर्थिक प्रगति और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसके अभूतपूर्व योगदान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी विकासशील स्थिति को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है. ग्लोबल टाइम्स संपादकीय के अनुसार दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते चीन के विकास और उसकी उपलब्धियों की सराहना तो की जा रही है, लेकिन इसके आड़ में पश्चिमी मीडिया और संस्थानों द्वारा एक नया नैरेटिव गढ़ने का प्रयास भी शुरू हो चुका है. 


वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसे पश्चिमी समाचार पत्रों का दावा है कि चीन अब उच्च आय वाले देशों की श्रेणी में शामिल होने की कगार पर है और वह अपने विकासशील देश के दर्जे से मिलने वाले अंतरराष्ट्रीय लाभों को छोड़ना नहीं चाहता. हालांकि, चीन ने इस तरह के तर्कों को पूरी तरह से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि उच्च आय वर्ग का हिस्सा होना और एक विकसित देश होना दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं. पश्चिमी जगत केवल चीन पर उसकी क्षमता से अधिक अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियां लादने और उसे वैश्विक दक्षिण के उसके स्वाभाविक साथियों से अलग-थलग करने के उद्देश्य से ऐसे भ्रामक आंकड़े पेश कर रहा है.


प्रतिव्यक्ति जीएनआई और वास्तविक विकास का अंतर


विश्व बैंक के नवीनतम अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2025 में चीन की प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय यानी जीएनआई 14,230 डॉलर दर्ज की गई है, जो उच्च आय श्रेणी की सीमा 14,375 डॉलर से महज थोड़ी ही नीचे है. पश्चिमी विश्लेषक इसी आंकड़े को आधार बनाकर चीन को विकसित देशों की सूची में धकेलने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि, विश्व बैंक की यह वर्गीकरण प्रणाली केवल प्रति व्यक्ति आय पर आधारित है और यह किसी देश के समग्र आधुनिकीकरण, औद्योगिक परिपक्वता या सार्वजनिक सेवाओं के स्तर का वास्तविक मूल्यांकन नहीं करती.


उदाहरण के तौर पर चिली, उरुग्वे, पनामा और कोस्टा रिका जैसे देशों ने भी उच्च आय श्रेणी की सीमा को पार कर लिया है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय उन्हें विकसित देशों के बजाय विकासशील या उभरती अर्थव्यवस्थाएं ही मानता है. इसलिए केवल आर्थिक आंकड़े के आधार पर चीन को विकसित देश घोषित करना तार्किक नहीं है.


चीन के समक्ष मौजूद आंतरिक आर्थिक चुनौतियां


यदि पश्चिमी विकसित देशों के विकास क्रम को देखा जाए तो वे अत्यधिक परिपक्व औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और समग्र आधुनिकीकरण के बाद उस स्थिति में पहुंचे हैं. वहां प्रति व्यक्ति धन, सामाजिक सुरक्षा प्रणाली, सार्वजनिक सेवा क्षमता और वैज्ञानिक नवाचार बेहद सुदृढ़ हैं. इसके विपरीत, चीन भले ही सकल घरेलू उत्पाद के मामले में विश्व में दूसरे स्थान पर है, लेकिन उसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी अभी भी अमेरिका और यूरोपीय देशों की तुलना में काफी कम है.


चीन में आज भी क्षेत्रीय विकास का असंतुलन बना हुआ है और शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों के बीच व्यापक अंतर मौजूद है. इन सभी व्यावहारिक संकेतकों से यह स्पष्ट होता है कि चीन का मूल स्वरूप आज भी एक विकासशील देश का ही है और इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए.


ग्लोबल साउथ से चीन को अलग करने की साजिश


चीन के लिए विकासशील देश होने का दर्जा केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक विशेष राजनीतिक पहचान है. चीन हमेशा से 'ग्लोबल साउथ' का एक अभिन्न अंग रहा है, जो समान ऐतिहासिक परिस्थितियों, साझा विकास लक्ष्यों और राजनीतिक आकांक्षाओं वाले देशों का एक मजबूत समूह है. पश्चिमी शक्तियां जो चीन को विकसित देश का टैग देने के लिए उतावली दिखाई दे रही हैं,


वे दरअसल चीन की प्रगति का जश्न नहीं मना रही हैं, बल्कि उसे ग्लोबल साउथ के कुनबे से बाहर निकालने की साजिश रच रही हैं. उनका मुख्य उद्देश्य चीन के विकास के दायरे को सीमित करना और विकासशील देशों के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी करना है.


वैश्विक दायित्वों के प्रति चीन की प्रतिबद्धता


किसी देश की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों का मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि उस पर क्या लेबल लगा है, बल्कि इससे होना चाहिए कि वह वैश्विक कल्याण में कितना योगदान दे रहा है. चीन वैश्विक आर्थिक वृद्धि में प्रतिवर्ष लगभग 30 प्रतिशत का योगदान देता है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में सबसे बड़ा शांति सेना योगदानकर्ता है.


अपने वैश्विक पहलों के माध्यम से चीन ने लगातार विश्व शांति और समावेशी विकास के लिए ठोस समाधान प्रस्तुत किए हैं. चीन का यह योगदान कई विकसित देशों से भी आगे है, फिर भी वह पूरी संजीदगी और जिम्मेदारी के साथ स्वयं को विकासशील दुनिया का ही हिस्सा मानता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP