क्या अब इंजीनियर करेंगे फैसला कि डॉक्टर कौन सी दवा लिखेंगे?
रायपुर । सीजीखबर डेस्क: भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) की नियुक्ति के नियमों में किए गए हालिया बदलाव ने एक नई और गंभीर बहस को जन्म दे दिया है. नए नियमों के तहत अब इस पद के लिए बायोमेडिकल, केमिकल इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस जैसी मास्टर डिग्री धारक भी पात्र होंगे. यह बदलाव 2011 के उन नियमों की जगह लेगा, जिनमें इस पद के लिए फार्मेसी, फार्मास्युटिकल केमिस्ट्री या क्लिनिकल फार्माकोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी में विशेषज्ञता रखने वाले मेडिकल डिग्री धारकों को ही अनिवार्य माना गया था.
इस निर्णय के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या अब एक इंजीनियर यह तय करेगा कि देश के सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर मरीजों को कौन सी दवा लिखेंगे?
DCGI का पद केवल एक प्रशासनिक पद नहीं है, बल्कि यह भारत के टीकों, चिकित्सा उपकरणों और दवाओं के मानकों का वैज्ञानिक संरक्षक होता है. भारत को 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' कहा जाता है. दुनिया के 165 से अधिक देशों में भारत की दवाएं निर्यात होती हैं. अफ्रीका के कई देश तो पूरी तरह भारतीय दवाओं पर निर्भर हैं, वहीं अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी भारत की जेनेरिक दवाएं अपनी गुणवत्ता के कारण धड़ल्ले से बिक रही हैं.
ऐसे में इस वैश्विक साख को बनाए रखने के लिए DCGI का पद किसी ऐसे व्यक्ति के पास होना चाहिए जिसके पास दवाओं का गहरा वैज्ञानिक ज्ञान हो.
आज का युग चिकित्सा विज्ञान में सुपर स्पेशलाइजेशन का है. जहां MBBS, MS और MD के बाद भी डॉक्टर DM, MCh, DNB और DNRB जैसी उच्च डिग्रियां हासिल करते हैं, वहां एक इंजीनियर को दवाओं की जटिल संरचना और उनके मानव शरीर पर प्रभाव की समझ कैसे हो सकती है? एक इंजीनियर को यह कैसे पता होगा कि किस बीमारी में कौन सी दवा, किस डोज में दी जानी चाहिए?
यह तर्क देना कि चिकित्सा उपकरणों के निर्माण और परीक्षण के लिए इंजीनियरिंग ज्ञान जरूरी है, दवा नियामक प्रणाली के मूल सिद्धांतों के साथ समझौता करने जैसा है. ड्रग कंट्रोल ऑफिसर्स (I) Welfare Association (DCOIWA) और ड्रग इंस्पेक्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन (DIWA) ने भी इसे 'पॉलिसी लैप्स' बताते हुए चेतावनी दी है कि इससे भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंच सकता है.
80 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान जब इस पद को अपग्रेड किया गया था, तब स्पष्ट रूप से अनुभवी फार्मेसी पेशेवरों की आवश्यकता पर बल दिया गया था. विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने और वैश्विक मानकों के साथ तालमेल बिठाने के लिए DCGI की पात्रता को और कड़ा किया जाना चाहिए था.
आज जरूरत तो यह है कि इस पद के लिए DM, MCh या DNRB जैसी डिग्रियां अनिवार्य की जाएं, ताकि एक उच्च शिक्षित डॉक्टर ही दवाओं और उपचार पद्धतियों पर वैज्ञानिक निर्णय ले सके. यदि तकनीकी विशेषज्ञता और दवा नियामक अनुभव को दरकिनार कर किसी कम योग्यता या अप्रासंगिक बैकग्राउंड वाले व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है, तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ एक बड़ा खिलवाड़ होगा. सरकार को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि सवाल देश की साख और करोड़ों लोगों की जान का है.
Indian Pharmaceutical Association (IPA) ने भी विरोध जताया
भारतीय औषधि महानियंत्रक (DCGI) के पद के लिए अधिसूचित नए भर्ती नियमों (RR), 2026 को लेकर विवाद गहराता जा रहा है. अब देश में फार्मा पेशेवरों की प्रमुख संस्था, इंडियन फार्मास्युटिकल एसोसिएशन (IPA) ने इन नियमों का पुरजोर विरोध करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को एक विस्तृत पत्र लिखा है.
IPA के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. सुभाष सी. मंडल द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र में तर्क दिया गया है कि आवश्यक योग्यताओं में गैर-फार्मेसी इंजीनियरिंग और विज्ञान विषयों को शामिल करना भारत के औषधि नियामक ढांचे की तकनीकी अखंडता से समझौता है. एसोसिएशन का कहना है कि नए नियम औषधि और प्रसाधन सामग्री नियम, 1945 के नियम 50A का सीधा उल्लंघन करते हैं, जिसके तहत इस पद के लिए फार्मेसी, फार्मास्युटिकल केमिस्ट्री या मेडिसिन में स्नातक होना अनिवार्य है.
IPA ने चिंता जताई है कि 'न्यू ड्रग्स एंड क्लिनिकल ट्रायल्स रूल्स, 2019' के तहत नई रासायनिक संस्थाओं का मूल्यांकन और विष विज्ञान जैसे जटिल कार्यों के लिए गहन फार्मास्युटिकल ज्ञान आवश्यक है. गैर-विशेषज्ञों की नियुक्ति से स्थिरता डेटा और बायो-इक्विवेलेंस अध्ययन के निर्णय में तकनीकी अंतर पैदा हो सकता है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण है.
डॉ. मंडल ने प्रतिनियुक्ति के मानदंडों पर भी सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि पे-मैट्रिक्स (लेवल 12-14) की वर्तमान शर्तें राज्य संवर्ग के योग्य अधिकारियों को इस दौड़ से बाहर कर देती हैं. IPA ने मांग की है कि अधिसूचना G.S.R. 296(E) को तत्काल स्थगित किया जाए.
IPA के साथ-साथ 'ड्रग्स कंट्रोल ऑफिसर्स वेलफेयर एसोसिएशन' (DCOIWA) और महाराष्ट्र के 'ड्रग्स इंस्पेक्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन' (DIWA) ने भी अपना विरोध दर्ज कराया है. इन संगठनों का स्पष्ट कहना है कि DCGI जैसे महत्वपूर्ण पद पर केवल वही व्यक्ति नियुक्त होना चाहिए जिसके पास प्रवर्तन कानूनों का जमीनी अनुभव और संबंधित तकनीकी पृष्ठभूमि हो.