रवि, 18 अक्टू. 2026

CGKhabar

पति की मर्जी के बिना पत्नी का क्लिनिक खोलना क्रूरता नहीं: सुप्रीम कोर्ट

C

CG Khabar

29 मई 2026, 07:48 AM 3 मिनट में पढ़ें 2

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और महिला सशक्तिकरण को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी पत्नी द्वारा अपने करियर का चुनाव करना या पेशेवर रूप से आगे बढ़ना किसी भी तरह से पति या उसके परिवार के प्रति 'क्रूरता' नहीं माना जा सकता. अदालत ने कहा कि अगर महिला के इस फैसले से पति या सास-ससुर की भावनाएं आहत होती हैं, तो भी इसे आधार बनाकर तलाक की अर्जी में क्रूरता का आरोप नहीं लगाया जा सकता. 


देश की शीर्ष अदालत का यह फैसला समाज में महिलाओं की स्वतंत्र पहचान और उनके अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

विज्ञापन


यह पूरा मामला एक डेंटिस्ट पत्नी और सेना के अधिकारी पति के बीच का है, जिनकी शादी साल 2009 में हुई थी. शादी के बाद पत्नी ने पुणे में अपनी डेंटल प्रैक्टिस शुरू की थी, जहां उस समय पति की पोस्टिंग थी. बाद में जब पति का तबादला कारगिल जैसी दूरदराज की जगह पर हो गया, तो पत्नी भी अपना सब कुछ छोड़कर उनके साथ चली गईं. हालांकि, बेटी के जन्म के बाद बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और बच्चे की सही परवरिश के लिए वह अहमदाबाद आ गईं. 


अहमदाबाद में उन्होंने अपने पैरों पर खड़े होने और आत्मनिर्भर बनने के लिए दोबारा अपना डेंटल क्लिनिक शुरू किया. लेकिन पति और इन-लॉज ने इस बात का विरोध किया कि उन्होंने बिना बताए क्लिनिक क्यों खोला. पारिवारिक अदालत और उच्च न्यायालय ने इस कदम को पति के प्रति क्रूरता और परित्याग (डेजर्टन) माना था, जिसके खिलाफ महिला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.


सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालतों के दृष्टिकोण पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे पूरी तरह से 'कानूनी रूप से अस्थिर और बेहद चिंताजनक' करार दिया. शीर्ष अदालत (केस नंबर 2026 INSC 475) ने अपने फैसले में कहा कि २१वीं सदी में भी एक योग्य महिला द्वारा अपने करियर को आगे बढ़ाने और बच्चे के सुरक्षित भविष्य के लिए किए गए प्रयासों को क्रूरता के रूप में देखा जाना बेहद खेदजनक है. 


कोर्ट ने कहा कि यह सोच एक सामंती और प्रतिगामी मानसिकता को दर्शाती है, जो आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के बिल्कुल विपरीत है. अदालत ने साफ किया कि शादी किसी महिला की व्यक्तिगत पहचान को खत्म नहीं करती है और न ही वह अपने पति के घर की महज एक वस्तु बनकर रह सकती है. दोनों पार्टनर्स को एक-दूसरे की आकांक्षाओं का सम्मान करना चाहिए.


सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में महिला पर लगे क्रूरता और परित्याग के सभी आरोपों को खारिज कर दिया और उनके रिकॉर्ड को पूरी तरह साफ कर दिया. हालांकि, अदालत ने तलाक की डिक्री को बरकरार रखा है, क्योंकि दोनों पक्ष अब साथ नहीं रहना चाहते थे. महिला अब शादी को आगे नहीं खींचना चाहती थीं और पति ने भी जीवन में आगे बढ़ते हुए दूसरी शादी कर ली थी. 


ऐसे में अदालत ने 'शादी के अपरिवर्तनीय रूप से टूट जाने' (इरिट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज) के आधार पर तलाक को मंजूरी दी. इसके साथ ही कोर्ट ने पत्नी के खिलाफ मुकदमा चलाने की पति की याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसे कोर्ट ने व्यक्तिगत प्रतिशोध की भावना से प्रेरित माना.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP