US छूट के बावजूद ईरानी तेल क्यों नहीं खरीदेगा भारत ?
नई दिल्ली । डेस्क: वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जारी उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच भारत फिलहाल ईरान से कच्चा तेल खरीदने के मूड में नहीं है. हालांकि अमेरिका ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों में 60 दिनों की अस्थायी ढील दी है और इस सिलसिले में ईरानी तेल मंत्री ने भारतीय समकक्ष हरदीप सिंह पुरी से मुलाकात भी की है, लेकिन भारतीय रिफाइनरियों ने अभी 'इंतजार करो और देखो' की नीति अपनाई है.
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि केवल दो महीने की छूट के भरोसे भारत कोई बड़ा सौदा नहीं करेगा, क्योंकि 60 दिनों के बाद प्रतिबंध दोबारा लागू होने का जोखिम बना हुआ है.
इसके अलावा, भारतीय तेल कंपनियों का रिफाइनरी प्लानिंग साइकिल दो से तीन महीने आगे चलता है, जिसके तहत जुलाई और अगस्त के पहले पखवाड़े तक के लिए तेल की आपूर्ति पहले ही सुनिश्चित की जा चुकी है.
मौजूदा समय में भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा रूस से पूरा कर रहा है. जून महीने में भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक रहने का अनुमान है, जो लगभग 2.3 से 2.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mbd) के करीब है.
रूस के साथ-साथ भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अमेरिका, नाइजीरिया, वेनेजुएला और ब्राजील जैसे देशों से भी खरीदारी बढ़ा दी है. विशेष रूप से अमेरिका से 'डब्ल्यूटीआई मिडलैंड' कच्चे तेल के आयात में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसमें इंडियन ऑयल सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है.
इसके अलावा भारत अमेरिका से लगभग 1 मिलियन मीट्रिक टन एलपीजी भी खरीद रहा है.
दूसरी ओर, स्ट्रेट ऑफ हारमुज बंद होने से पैदा हुए युद्ध के हालातों के बावजूद वैश्विक तेल बाजार में वैसी किल्लत देखने को नहीं मिली जैसी आशंका जताई जा रही थी.
इसका मुख्य कारण चीन में तेल की मांग में आई भारी गिरावट है, जहां आर्थिक सुस्ती, स्टील-सीमेंट उद्योगों की धीमी रफ्तार और इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण तेल की खपत करीब एक-तिहाई घट गई है.
चीन इस समय महंगे विदेशी तेल के बजाय अपने रणनीतिक भंडार का इस्तेमाल कर रहा है. ऐसे में ईरान के पास समुद्र में तैर रहे टैंकरों में करीब 88 मिलियन बैरल तेल का स्टॉक मौजूद है, जिसे वह चीन और भारत जैसे एशियाई देशों को बेचने की कोशिश में है.
हालांकि, प्रतिबंधों की अनिश्चितता और सुरक्षित आपूर्ति शृंखला को देखते हुए भारत अपनी वर्तमान आयात रणनीति में जल्दबाजी में कोई बदलाव नहीं करना चाहता.