दिशा वाडेकर ने UGC के नियमों के खिलाफ SC का रुख क्यों किया?
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता दिशा वाडेकर ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए भेदभाव-रोधी दिशानिर्देशों को लेकर दाखिल याचिका के जरिए कॉलेज परिसरों में भेदभाव की पहचान, शिकायत और समाधान की प्रक्रिया को मजबूत करने की मांग की है. वाडेकर का कहना है कि यह लड़ाई सज़ा देने की नहीं, बल्कि भेदभाव की रोकथाम के लिए प्रभावी संस्थागत सुरक्षा सुनिश्चित करने की है.
यह मामला 2019 में शुरू हुआ, जब मुंबई के टीएन टोपीवाला कॉलेज में पोस्टग्रेजुएट मेडिकल छात्रा डॉ. पायल तड़वी की आत्महत्या के बाद वाडेकर ने विश्वविद्यालयों में भेदभाव के खिलाफ मौजूदा नियमों की वास्तविक स्थिति की पड़ताल की. पायल तड़वी के परिवार ने वरिष्ठ डॉक्टरों पर जातिगत उत्पीड़न के आरोप लगाए थे, लेकिन संस्थान स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
जांच के दौरान वाडेकर को UGC की Promotion of Equity in Higher Educational Institutions Regulations, 2012 का पता चला, जिनमें समान अवसर प्रकोष्ठ (Equal Opportunity Cell) का प्रावधान था. लेकिन RTI के जरिए सामने आया कि बड़ी संख्या में संस्थानों ने इन नियमों को लागू ही नहीं किया था. कई संस्थानों ने या तो जवाब नहीं दिया या शिकायतों को केवल काउंसलिंग तक सीमित रखा.
इसके बाद वाडेकर, पायल तड़वी की मां आबिदा तड़वी और रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. याचिका में UGC से नियमों के सख्त प्रवर्तन, बहु-सदस्यीय शिकायत समिति, बाहरी निगरानी तंत्र, OBC को जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा में शामिल करने और गंभीर मामलों में पुलिस को अनिवार्य रिपोर्टिंग जैसी मांगें की गईं.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर UGC ने नियमों में संशोधन कर 13 जनवरी 2026 को नए दिशानिर्देश अधिसूचित किए. वाडेकर के अनुसार, नए नियमों में कुछ अहम प्रगति हुई है जैसे स्टाफ और संविदा कर्मियों को भी संरक्षण, एकल सदस्य के बजाय बहु-सदस्यीय इक्विटी कमेटी और गैर-अनुपालन पर UGC को कार्रवाई का अधिकार.
हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि संशोधित नियमों में जाति-आधारित भेदभाव के ठोस उदाहरणों को हटा दिया गया है, जिससे समितियों को अत्यधिक विवेकाधिकार मिल जाता है.
नए दिशानिर्देशों को लेकर देशभर में विरोध भी हो रहा है. कुछ समूहों का आरोप है कि ये सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ हैं. वाडेकर ने इन आरोपों को भ्रामक बताते हुए कहा कि ये नागरिक प्रकृति के नियम हैं, जिनमें जेल की सज़ा का प्रावधान नहीं है और ये संविधान के अनुच्छेद 15 के तहत सभी प्रकार के भेदभाव जाति, लिंग, धर्म, विकलांगता और जन्मस्थान को कवर करते हैं.
उन्होंने आगे कहा, "इसका मतलब यह नहीं है कि आप इसे खत्म कर दें."
यह मामला अब फिर से सुप्रीम कोर्ट के सामने है, लेकिन वाडेकर ने कहा कि मुख्य मुद्दा वही बना हुआ है.
उन्होंने कहा, "नियम कभी सज़ा के बारे में नहीं थे, वे रोकथाम के बारे में थे."
उनके लिए, यह मुकदमा लगातार एक संवैधानिक सवाल उठा रहा है. क्या उच्च शिक्षा में समानता का अधिकार लागू करने योग्य संस्थागत सुरक्षा उपायों के बिना मौजूद हो सकता है या क्या, उनके बिना, यह सिर्फ़ कागज़ पर एक वादा बनकर रह जाता है.