टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स में क्यों छिड़ी वर्चस्व की जंग?
नई दिल्ली । डेस्क: 158 साल पुराने प्रतिष्ठित टाटा समूह के इतिहास में एक बार फिर कॉर्पोरेट जगत का सबसे बड़ा शक्ति-प्रदर्शन देखने को मिल रहा है. समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी 'टाटा संस' और उसकी बहुलांश शेयरधारक 'टाटा ट्रस्ट्स' के बीच गहराया विवाद अब सरेआम हो चुका है. इस अभूतपूर्व गतिरोध की धुरी में चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के कार्यकाल का विस्तार, कंपनी का संभावित पब्लिक लिस्टिंग (आईपीओ) और शापूरजी पालोनजी समूह का निकास जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं. बंबई हाउस के कमरों से शुरू हुई यह खींचतान अब देश की अर्थव्यवस्था, लाखों निवेशकों और न्यायपालिका के गलियारों तक गूंजने लगी है.
चंद्रशेखरन का पुनर्गठन और 'ट्रस्ट' के भीतर मतभेद
इस पूरे घटनाक्रम में चिंगारी 17 सितंबर को तब लगी, जब टाटा संस के बोर्ड ने एक 4-1 के बहुमत से एन चंद्रशेखरन को फिर से चेयरमैन नियुक्त करने का फैसला किया. बोर्ड ने समूह के व्यापक हितों का हवाला देते हुए उनसे पद पर बने रहने का अनुरोध किया था. हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स के मौजूदा चेयरमैन और बोर्ड में ट्रस्ट के प्रतिनिधि नोएल टाटा ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए इसे अवैध करार दिया. उनका तर्क है कि टाटा संस के नियमों के तहत ट्रस्ट के दोनों नामांकित निदेशकों को एक साथ मिलकर मतदान करना चाहिए था, जबकि दूसरे निदेशक वेणु श्रीनिवासन ने चंद्रशेखरन के पक्ष में वोट दिया. रतान टाटा के निधन के बाद उभरी यह दरार अब सीधे अदालतों में सुलझने की राह पर है.
रिजर्व बैंक का नियम और आईपीओ पर खींचतान
विवाद का दूसरा सबसे बड़ा कारण टाटा संस की शेयर बाजार में संभावित लिस्टिंग है. भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार, 10.45 अरब डॉलर से अधिक की परिसंपत्तियों वाली कंपनियों को सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध होना अनिवार्य है. टाटा संस ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) के दर्जे से हटने की कोशिश की थी, लेकिन रिजर्व बैंक ने उसकी अर्जी खारिज कर दी. इसके बाद टाटा संस सार्वजनिक लिस्टिंग की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए तैयार है. दूसरी तरफ, नोएल टाटा का मानना है कि कंपनी को पब्लिक करने से उस ऐतिहासिक और परोपकारी चरित्र को नुकसान पहुंचेगा, जिसके लिए टाटा समूह को जाना जाता है.
शापूरजी पालोनजी समूह की हिस्सेदारी का मुद्दा
टाटा संस में 18.4 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला शापूरजी पालोनजी समूह भारी कर्ज के बोझ से दबने के कारण अपनी हिस्सेदारी से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहा है. नोएल टाटा ने इस हिस्सेदारी का एक हिस्सा (लगभग 2.61 अरब डॉलर) बेचने का प्रस्ताव रखा था. शापूरजी पालोनजी समूह खुद भी टाटा संस के पब्लिक लिस्टिंग के पक्ष में है, जो नोएल टाटा के रुख के विपरीत है. इस त्रिकोणीय स्थिति ने बोर्डरूम के समीकरणों को और अधिक जटिल बना दिया है.
भारतीय अर्थव्यवस्था और कॉर्पोरेट जगत पर असर
26 सूचीबद्ध कंपनियों और 277 अरब डॉलर के विशाल बाजार पूंजीकरण वाला टाटा समूह भारत के 1.77 करोड़ से अधिक छोटे-बड़े निवेशकों के हितों से जुड़ा है. आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े और प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण औद्योगिक घराने का बाजार की पारदर्शिता से बाहर रहना अब संभव नहीं है. देश में शीर्ष कॉर्पोरेट घरानों के बढ़ते एकाधिकार और मूल्य नियंत्रण को देखते हुए टाटा संस की लिस्टिंग को कॉर्पोरेट गवर्नेंस के नजरिए से भी अहम माना जा रहा है.
अदालत के पाले में टाटा का भविष्य
टाटा समूह के लिए शीर्ष स्तर की यह जंग नई नहीं है. इससे पहले साइरस मिस्त्री के साथ हुई कानूनी लड़ाई में टाटा संस की जीत हुई थी. इस बार भी देश के दिग्गज कानूनी महारथी मैदान में उतर चुके हैं. पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे जहां टाटा संस की पैरवी कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी टाटा ट्रस्ट्स का पक्ष रख रहे हैं. 100 साल से भी अधिक पुराने इस पारिवारिक व व्यावसायिक संबंध में आई यह दरार आने वाले दिनों में भारतीय कॉर्पोरेट गवर्नेंस का नया इतिहास लिखेगी.