कौन है नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाली नवी पिल्ले?
नई दिल्ली । डेस्क: दक्षिण अफ्रीका की प्रख्यात न्यायविद और मानवाधिकार कार्यकर्ता नवनेथम "नवी" पिल्ले को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की गई है. इस सम्मान के साथ ही वह नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाली दक्षिण अफ्रीका की पांचवीं शख्सियत बन गई हैं. नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने उनके दशकों लंबे न्यायिक करियर, नरसंहार और युद्ध अपराधों के खिलाफ उनके साहसिक संघर्ष तथा अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने में उनके योगदान की सराहना की है. दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ लड़ाई से लेकर अंतरराष्ट्रीय अदालतों में न्याय की अलख जगाने तक, नवी पिल्ले का जीवन सिद्धांतों और निष्पक्षता की मिसाल रहा है.
नस्लभेद के खिलाफ संघर्ष से लेकर कानूनी क्रांति तक
नवी पिल्ले का जन्म 1940 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर में तमिल मूल के एक भारतीय परिवार में हुआ था. उस दौर में दक्षिण अफ्रीका रंगभेद की भयानक नीति से जूझ रहा था. नेटाल विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल करने के बाद नवी पिल्ले नेटाल प्रांत में अपनी लॉ फर्म शुरू करने वाली पहली महिला बनीं. अपने शुरुआती करियर में उन्होंने रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं को कानूनी सुरक्षा प्रदान की और राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी.
वर्ष 1973 में उन्होंने रोबेन द्वीप पर कैद राजनीतिक बंदियों के लिए मौलिक अधिकारों और कानूनी पहुंच की मांग को लेकर एक ऐतिहासिक कानूनी जीत हासिल की. रोबेन द्वीप वही जगह है जहां नेलसन मंडेला को वर्षों तक कैद रखा गया था. रंगभेद खत्म होने के बाद पिल्ले दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय में न्यायाधीश बनने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं.
अंतरराष्ट्रीय मंच पर नरसंहार और मानवाधिकारों की लड़ाई
नवी पिल्ले का काम केवल दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून को एक नई दिशा दी. 1994 के रवांडा नरसंहार के मुकदमों की सुनवाई करने वाले अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (ICTR) की उन्होंने अध्यक्षता की. इस दौरान उन्होंने दो ऐतिहासिक मिसालें कायम कीं. पहला, बलात्कार और यौन हिंसा को मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार का हिस्सा घोषित करना. दूसरा, केवल नफरती प्रचार फैलाने के आधार पर किसी आरोपी को नरसंहार के उकसावे का दोषी ठहराना.
वर्ष 2008 से 2014 तक वह संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCHR) रहीं. इसके बाद उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के उस स्वतंत्र जांच आयोग का नेतृत्व किया, जिसने गाजा में इजरायल की कार्रवाई की समीक्षा की और उसे नरसंहार के लिए जिम्मेदार ठहराया. वर्तमान में वह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में म्यांमार के खिलाफ रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार मामले में बतौर न्यायाधीश अपनी सेवाएं दे रही हैं.
नोबेल समिति की घोषणा और अंतरराष्ट्रीय कानून का महत्व
नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने पिल्ले को अंतरराष्ट्रीय कानून और शांति को बढ़ावा देने के लिए एक महान रक्षक करार दिया है. समिति का मानना है कि ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक न्याय व्यवस्था भारी दबाव और हमलों का सामना कर रही है, नवी पिल्ले का सम्मान करना दुनिया को कानून के शासन की याद दिलाता है. शांति हमेशा न्याय पर टिकी होती है और पिल्ले ने अपना पूरा जीवन पीड़ितों को न्याय दिलाने और वैश्विक नेताओं को कानून के दायरे में लाने में लगा दिया है.
वैश्विक मानवाधिकार प्रमुखों, संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने पिल्ले को बधाई देते हुए इस पुरस्कार को न्याय, निष्पक्षता और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का सम्मान बताया है.
पुरस्कार मिलने पर नवी पिल्ले की प्रतिक्रिया
पुरस्कार की घोषणा के समय नवी पिल्ले जर्मनी के नूर्नबर्ग में मानवाधिकार वकीलों के एक सम्मेलन में मौजूद थीं. शुरुआत में उन्हें खबर पर विश्वास ही नहीं हुआ और उन्होंने मजाकिया अंदाज में अपने समर्थकों से पूछा कि क्या यह सच है. उन्होंने कहा कि जब लोगों ने गाजा रिपोर्ट के लिए उनके साहस की तारीफ की, तो उन्हें हैरानी हुई क्योंकि सच बोलने और कानून की निष्पक्ष व्याख्या करने के लिए साहस की नहीं, केवल तथ्यों की जरूरत होती है.
नवी पिल्ले ने इस सर्वोच्च सम्मान को दुनिया भर के अंतरराष्ट्रीय अपराधों के सभी पीड़ितों और जीवित बचे लोगों को समर्पित किया है. उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार उनके इस विश्वास को और मजबूत करता है कि सभी को एक स्वतंत्र न्यायिक प्रणाली और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की रक्षा के लिए एकजुट होना होगा.